जयपुर , जनवरी 13 -- राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने सिंधी समाज को भारत की बहुसांस्कृतिक आत्मा का एक सशक्त और गौरवपूर्ण अंग बताते हुए कहा है कि समाज की जड़े सिंधु घाटी की प्राचीन सभ्यता से जुड़ी हुई हैं और इसने विभाजन में भारी पीड़ा और विस्थापन सहा तथा ऐसी स्थितियों में भी समाज ने अपनी भाषा, संस्कृति और आत्मसम्मान को अक्षुण्ण रखते हुए भारत में नए सिरे से जीवन आरंभ किया।
श्री देवनानी महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय अजमेर के सिंधु शोध पीठ एवं राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में भारत के विकास में सिंधी समुदाय के योगदान विषय पर मंगलवार को आयोजित एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी तथा पारितोषिक वितरण कार्यक्रम बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि परिश्रम, ईमानदारी और उद्यमशीलता के बल पर सिंधी समाज ने व्यापार, उद्योग, शिक्षा और सेवा के क्षेत्रों में देश की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
उन्होंने कहा कि अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों और सामाजिक सेवाओं के माध्यम से इस समाज ने राष्ट्र के मानव संसाधन को सशक्त किया। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर स्वतंत्र भारत तक सिंधी समाज ने बलिदान, नेतृत्व और राष्ट्रभक्ति की मिसालें प्रस्तुत की हैं। सिंधी भाषा, लोकसंस्कृति और सनातन मूल्य भारतीय सांस्कृतिक विविधता को समृद्ध करते हैं। आज भी यह समाज आर्थिक विकास के साथ सांस्कृतिक संरक्षण और सामाजिक समरसता के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
इस अवसर पर हरि सेवा धाम भीलवाडा के महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम ने अपने उदबोधन में बताया कि सिंधी समाज की भाषा, संस्कृति और अस्मिता के संरक्षण का सशक्त आहवान है। सिंधु केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि सनातन सभ्यता का जीवंत केंद्र रहा है। आज भाषा के लुप्त होने के साथ संस्कृति और पहचान भी संकट में है।
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