इटावा , सितंबर 11 -- उत्तर प्रदेश के इटावा में भारी बरसात से राज्य पक्षी सारस के प्रजनन और नेस्टिंग पर असर पड़ने का अंदेशा जताया जा रहा है। सारस के सबसे बड़े आशियाने के रूप में पहचान रखने वाले इटावा में वन विभाग के हालिया सर्वेक्षण में अब तक केवल 17 नेस्ट मिले हैं, जबकि पिछले वर्ष 47 नेस्ट मिले थे।

इटावा के जिला वन अधिकारी विकास नायक ने बताया कि भारी बरसात से सारस के प्रजनन पर व्यापक असर पड़ने की संभावना है। बरसात के कारण सारस की नेस्टिंग साइट में बदलाव हुआ है, जिसके चलते वन विभाग की टीमों को पूर्व की तुलना में कम नेस्ट मिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि बारिश ने सारस की नेस्टिंग को कहीं न कहीं प्रभावित किया है।

उन्होंने बताया कि इटावा में सारसों की संख्या प्रदेश में सबसे अधिक है। हालिया गणना के अनुसार जिले में 3,304 सारस पाए गए हैं। बड़ी संख्या में सारसों की मौजूदगी यहां के लोगों के पक्षी के प्रति लगाव और संरक्षण की भावना को दर्शाती है। वन विभाग के अनुसार इटावा की भौगोलिक परिस्थितियां सारसों के लिए अनुकूल हैं। यहां पर्याप्त जलक्षेत्र, धान के खेत, दलदल, तालाब, झील और अन्य जलस्रोत उपलब्ध हैं। इन क्षेत्रों में पाई जाने वाली वनस्पतियां, कृषि खाद्यान्न, छोटी मछलियां, कीड़े-मकोड़े, छोटे सांप, घोंघे और सीपियां सारसों के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराते हैं।

सारस को दुनिया का सबसे ऊंचा उड़ने वाला पक्षी माना जाता है और यह किसानों का मित्र भी है। करीब 12 किलोग्राम वजन वाले सारस की लंबाई लगभग 1.6 मीटर होती है तथा इसका जीवनकाल 35 से 80 वर्ष तक बताया जाता है। सारस वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची में संरक्षित पक्षी है।

सारस भारत के अलावा नेपाल, पाकिस्तान, चीन, म्यांमार, कंबोडिया, थाईलैंड, वियतनाम और ऑस्ट्रेलिया में भी पाया जाता है। देश में सारस की छह प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें इंडियन सारस क्रेन, डेमोइसिल क्रेन और कॉमन क्रेन इटावा में देखी जाती हैं।

जानकारों के अनुसार इटावा में सारसों की बड़ी संख्या और उनके लिए अनुकूल प्राकृतिक वातावरण के कारण यह क्षेत्र इनके संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण है। भारी बरसात के बाद नेस्टिंग में आए संभावित बदलाव पर वन विभाग की निगाह बनी हुई है।

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