(जयंत रॉय चौधरी से)नयी दिल्ली , जनवरी 26 -- इक्कीसवीं सदी की बहु-ध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था की वास्तविकता के बीच भारत ने सोमवार को अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन किया। इस अवसर पर संभावित नए सुरक्षा सहयोगी यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन मौजूद थे।

जहाँ एक ओर भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) लंबे समय से लंबित मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को अंतिम रूप देने के लिए बातचीत कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दोनों पक्ष इस सप्ताह एक 'सुरक्षा और रक्षा साझेदारी' के माध्यम से सहयोग मजबूत करने पर भी विचार कर रहे हैं। इस व्यापार समझौते में भारत द्वारा आयातित महंगी कारों पर सीमा शुल्क में भारी कटौती शामिल हो सकती है।

शीर्ष अधिकारियों के अनुसार दोनों पक्ष समुद्री सुरक्षा (विशेषकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र), निरस्त्रीकरण, अंतरिक्ष, आतंकवाद विरोधी अभियान और साइबर खतरों से निपटने के लिए 'करीबी सहयोग ' पर काम कर रहे हैं। यूरोपीय संघ में भारत की पूर्व राजदूत भास्वती मुखर्जी ने कहा, "यूरोपीय संघ अब भारत को नई वैश्विक व्यवस्था में एक मूल्यवान सहयोगी के रूप में देखता है।"व्यापार के मोर्चे पर एक अधिकारी ने पुष्टि की कि 15,000 यूरो (लगभग 16 लाख रुपये) से अधिक कीमत वाली पेट्रोल और डीजल कारों पर शुल्क को वर्तमान 70-110 प्रतिशत से घटाकर आधा करने पर सहमति बन सकती है। हालांकि, भारत के उभरते इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग की सुरक्षा के लिए बैटरी चालित वाहनों को पांच साल तक इस समझौते से बाहर रखा जाएगा।

सोमवार को 77वें गणतंत्र दिवस परेड में भारत के सैन्य नवाचारों जैसे 'सूर्यास्त्र' मिसाइल लॉन्चर और स्वदेशी 'जोल्ट' ड्रोन का प्रदर्शन किया गया, जिसे श्री कोस्टा और सुश्री लेयेन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ देखा।

सुश्री मुखर्जी ने कहा कि आज की दुनिया में केवल 'सॉफ्ट पावर' काम नहीं आती, इसलिए यूरोप अब अपनी सैन्य क्षमताओं को बढ़ाने पर ध्यान दे रहा है। यूक्रेन युद्ध और अमेरिका की सुरक्षा गारंटियों पर उठते सवालों के बीच, भारत अब यूरोप के लिए केवल हथियार खरीदार ही नहीं, बल्कि गोला-बारूद का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है। वर्ष 2022 से 2024 के बीच भारत का रक्षा निर्यात 13.5 करोड़ डॉलर से अधिक रहा है।

टाटा, रिलायंस और भारत फोर्ज जैसी भारतीय कंपनियों ने डसॉल्ट और एयरबस जैसे यूरोपीय दिग्गजों के साथ साझेदारी की है। दोनों पक्ष लाल सागर में समुद्री डकैती विरोधी अभियानों और समुद्री गश्त में भी सहयोग कर रहे हैं। अधिकारियों का मानना है कि चूंकि अमेरिका अब स्थायी सुरक्षा गारंटी प्रदान नहीं कर सकता, इसलिए यूरोपीय देशों को हिंद महासागर और प्रशांत क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बढ़ानी होगी।

सुरक्षा के मोर्चे पर, यूरोपीय संघ चाहता है कि 'यूरोपोल' और भारत की 'सीबीआई' के बीच सहयोग और गहरा हो। इसके साथ ही, दोनों पक्ष एक 'सूचना सुरक्षा समझौते' पर हस्ताक्षर करना चाहते हैं, जिससे गोपनीय जानकारी साझा करना आसान हो सके और भविष्य में भारत की भागीदारी यूरोपीय संघ की रक्षा पहलों में बढ़ सके।

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