मुंबई , जून 11 -- भारत में काम करने वाली 39 प्रतिशत महिलाएं गर्भपात की जानकारी साझा करने पर नौकरी जाने या करियर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका से डरती हैं और 40 प्रतिशत महिलाएं आलोचना के भय से चुप्पी साधे रहती हैं।

इंजीनियरिंग सेवा कंपनी क्वेस्ट ग्लोबल ने यूगॉव द्वारा संयुक्त रूप से कराये गये शोध के हवाले से यह जानकारी दी है। यह सर्वेक्षण देश भर में 25-39 वर्ष आयु वर्ग की 2,000 महिलाओं और 200 पुरुषों के बीच किया गया, जिसमें स्टेम, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और कॉर्पोरेट क्षेत्रों के जूनियर, मिड और सीनियर प्रबंधन स्तर के कर्मचारी तथा विविध टीमों का नेतृत्व करने वाले पुरुष प्रबंधक शामिल थे।

अध्ययन के अनुसार अधिकांश महिलाएं अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि भय के कारण चुप रहती हैं। लगभग 39 प्रतिशत महिलाएं गर्भपात की जानकारी साझा करने पर नौकरी जाने या करियर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने से डरती हैं, जबकि 40 प्रतिशत महिलाएं दूसरों के आकलन और आलोचना के भय से चुप्पी साधे रहती हैं।

इसके अलावा, 35 प्रतिशत भारतीय महिलाएं कहती हैं कि यदि गर्भपात के बाद उन्हें नियोक्ता का सहयोग नहीं मिला, तो वे नौकरी छोड़ने पर विचार कर सकती हैं। चार में से तीन महिलाओं ने माना कि गर्भपात उनके आत्मविश्वास को कम करती है, जिससे उनके कार्य प्रदर्शन पर भी असर पड़ता है।

इसमें कहा गया है कि कार्यस्थलों पर इस विषय पर शायद ही कभी खुलकर चर्चा होती है। अधिकांश महिलाएं इसे चुपचाप सहन करती हैं और अक्सर उन्हें दूसरों के निर्णय या अपने करियर पर पड़ने वाले प्रभाव का डर सताता है। इसे देखते हुए क्वेस्ट ग्लोबल ने 'ब्रेक द साइलेंस' नामक देशव्यापी कैंपेन की शुरुआत की है। यह अपनी तरह का पहला अभियान है, जिसका उद्देश्य गर्भपात को कार्यस्थल की बातचीत का हिस्सा बनाना है।

क्वेस्ट ग्लोबल के सह-संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) अजीत प्रभु ने कहा, "बहुत लंबे समय से गर्भपात पर विमर्श कार्यस्थलों पर अदृश्य बना हुआ है। महिलाएं अपने दुख के साथ चुपचाप काम करती रहती हैं। हमारा शोध दर्शाता है कि इस चुप्पी की कीमत उत्पादकता, आत्मविश्वास और करियर विकास के रूप में चुकानी पड़ती है। यह केवल कल्याण का नहीं, बल्कि कार्यबल का भी मुद्दा है। मैं भारत के सभी सीईओ और व्यावसायिक प्रमुखों से अपील करता हूं कि वे गर्भपात को कार्यस्थल की वास्तविकता के रूप में स्वीकार करें और ऐसे कार्यस्थल बनाएं जहां हर व्यक्ति स्वयं को सुरक्षित, समर्थित और सशक्त महसूस करे।"क्वेस्ट ग्लोबल ने 'योर दोस्त' के साथ मिलकर एक सहायता व्यवस्था शुरू की है। इसमें 24 घंटे की हेल्पलाइन, गोपनीय परामर्श, सहकर्मी सहायता, एचआर और प्रबंधकों के लिए प्रशिक्षण सामग्री, जागरूकता वेबिनार और अन्य संसाधन शामिल हैं। कंपनी ने यह भी तय किया है कि ये सभी सेवाएं भारत के सभी लोगों और संगठनों के लिए मुफ्त में उपलब्ध होंगी।

शोध में यह भी सामने आया कि 48 प्रतिशत महिलाएं मानती हैं कि सुरक्षित माहौल मिलने पर वे खुलकर बात कर सकती हैं, 43 प्रतिशत महिलाएं ऐसे नियोक्ता के प्रति अधिक वफादारी दिखाएंगी, और 45 प्रतिशत महिलाएं ऐसी कंपनी की सिफारिश दूसरों को करेंगी।

क्वेस्ट ग्लोबल की मुख्य रणनीति अधिकारी युमी क्लेवेंजर-ली ने कहा, "हर आंकड़े के पीछे एक ऐसी महिला है जो भीतर के दर्द को छिपाकर आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है। ऐसे समय में मिला सहयोग यह तय कर सकता है कि वह खुद को संगठन का हिस्सा महसूस करती है या नहीं, नौकरी में बनी रहती है या नहीं और अपने करियर में आगे बढ़ पाती है या नहीं।"कंपनी की वरिष्ठ उपाध्यक्ष (मानव संसाधन एवं संस्कृति) सोनिया कुट्टी ने कहा, "यह शोध उस वास्तविकता को सामने लाता है जिसे लंबे समय से महसूस किया जा रहा था लेकिन नाम नहीं दिया गया। महिलाएं इस दर्द को अकेले झेलती हैं और अक्सर पेशेवर नुकसान के डर से मदद नहीं मांगतीं। केवल नीतियां नहीं, बल्कि ऐसा कार्यस्थल बदलाव लाता है जहां चुप्पी आवश्यक न लगे।"क्वेस्ट ग्लोबल का मानना है कि यह ऐसा मुद्दा है जिसे कोई एक व्यक्ति या संगठन अकेले हल नहीं कर सकता। इसी सोच के साथ कंपनी अन्य संगठनों को भी इस पहल से जुड़ने के लिए आमंत्रित कर रही है। गर्भपात हर उद्योग, हर कार्यालय और हर टीम को प्रभावित करती है। जैसे-जैसे अधिक संगठन इसे स्वीकार करेंगे, 'ब्रेक द साइलेंस' एक कार्यक्रम से आगे बढ़कर एक जन-आंदोलन का रूप ले सकता है।

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