नीमली , फरवरी 26 -- देश में वायु प्रदूषण की समस्या के मुकाबले निगरानी तंत्र की गति पीछे छूट रही है। 2026 की 'स्टेट ऑफ इंडियाज़ एनवायरनमेंट' रिपोर्ट के अनुसार भारत की केवल 15 प्रतिशत आबादी ही किसी सतत निगरानी केंद्र से 10 किलोमीटर के दायरे में रहती है, जबकि शेष 85 प्रतिशत यानी 1.2 अरब से अधिक लोग किसी मापनीय दायरे से बाहर सांस लेने को मजबूर हैं। यह रिपोर्ट सेंटर फॉर साइंस एण्ड एनवायरमेंट और उसकी पत्रिका डाउन टू अर्थ द्वारा 2026 के अनिल अग्रवाल डॉयलाग 2026 में जारी की गई।

रिपोर्ट के अनुसार भारत में वायु गुणवत्ता की निगरानी के दो प्रमुख ढांचे हैं। राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम, जिसकी शुरुआत 1984-85 में हुई थी, मैनुअल स्टेशनों पर आधारित है जो सप्ताह में दो बार मापन करते हैं। इसके अलावा सतत वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्र स्थापित किए गए हैं, जो प्रति घंटे वास्तविक समय का आंकड़ा उपलब्ध कराते हैं।

वर्तमान में देश में 294 शहरों में 562 वास्तविक समय निगरानी केंद्र तथा 419 शहरों और कस्बों में 966 मैनुअल स्टेशन संचालित हैं। हालांकि रिपोर्ट में कहा गया है कि ये केंद्र मुख्यतः बड़े शहरों तक सीमित हैं, जबकि अनेक जिले, औद्योगिक क्षेत्र और तेजी से विकसित हो रहे उपनगरीय इलाके निगरानी तंत्र से बाहर हैं। देश के 742 जिलों में से 64 प्रतिशत से अधिक में कोई भी सतत निगरानी व्यवस्था नहीं है।

राज्यों की स्थिति पर नजर डालें तो चंडीगढ़ में शत-प्रतिशत आबादी 10 किलोमीटर के दायरे में आती है। दिल्ली दूसरे स्थान पर है, जहां केवल 3.5 प्रतिशत आबादी ही निगरानी दायरे से बाहर है। पुडुचेरी में लगभग 50 प्रतिशत क्षेत्र कवर है।

महाराष्ट्र में निगरानी केंद्रों की संख्या अधिक है, लेकिन वे मुंबई, पुणे और नागपुर जैसे शहरों तक सीमित हैं। बिहार में केवल 13 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में मात्र 9 प्रतिशत आबादी 10 किलोमीटर के दायरे में आती है। पश्चिम बंगाल में यह आंकड़ा 19 प्रतिशत है, जबकि हुगली और मुर्शिदाबाद जैसे घनी आबादी वाले जिलों में एक भी वास्तविक समय निगरानी केंद्र नहीं है। पूर्वोत्तर में असम को छोड़ अधिकांश राज्यों में एक-दो केंद्र ही हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि दैनिक वायु गुणवत्ता सूचकांक, नीतिगत आकलन और प्रदर्शन आधारित अनुदान देश के एक छोटे शहरी हिस्से के आंकड़ों पर आधारित हैं। शेष क्षेत्रों में प्रदूषण लोगों के जीवन का हिस्सा तो है, लेकिन दर्ज नहीं हो पाता।

विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि भविष्य की निगरानी व्यवस्था एक समन्वित मॉडल पर आधारित हो, जिसमें मानक स्तर के उपकरणों के साथ कम लागत वाले सत्यापित सेंसर और उपग्रह आधारित आंकड़ों को जोड़ा जाए। साथ ही विद्यालयों, अस्पतालों और उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों को प्राथमिकता देते हुए केंद्र स्थापित किए जाएं तथा बदलते शहरी स्वरूप के अनुसार निगरानी केंद्रों का पुनर्स्थापन किया जाए।

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