नयी दिल्ली , मई 23 -- शीत जल मत्स्य पालन क्षेत्र आज देश की नीली अर्थव्यवस्था का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ बनकर उभरा है। यह क्षेत्र पर्वतीय क्षेत्रों में आजीविका के नए अवसर पैदा करने, पोषण स्तर में सुधार करने, पारिस्थितिकी-पर्यटन को बढ़ावा देने और पहाड़ों के सतत विकास में ऐतिहासिक भूमिका निभा रहा है।
कभी हिमालय की नदियों में पारंपरिक रूप से मछली पकड़ने तक सीमित रहने वाला यह क्षेत्र, आज वैज्ञानिक खेती और आधुनिक बुनियादी ढांचे की बदौलत एक अत्याधुनिक जलीय कृषि पारिस्थितिकी तंत्र का रूप ले चुका है।
देश के उच्च पर्वतीय इलाकों में बर्फ से ढकी नदियों, झरनों, झीलों और तालाबों में शीत जल मत्स्य पालन किया जा रहा है। इसके लिए आदर्श तापमान 5 डिग्री सेल्सियस से 25 डिग्री सेल्सियस के बीच, घुली हुई ऑक्सीजन 6 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक और पीएच स्तर 6.5 से 8.0 के बीच होना अनिवार्य है। वर्तमान में रेनबो ट्राउट, गोल्डन महासीर और स्नो ट्राउट जैसी मूल्यवान मछलियों को आधुनिक हैचरी, रेसवे, आरएएस, बायोफ्लॉक प्रणाली और कोल्ड चेन जैसी विशेष सुविधाओं के माध्यम से पाला जा रहा है। ट्राउट मछली का पालन आमतौर पर 1,500 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर होता है, जबकि महासीर पालन कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अधिक सफल रहा है।
शीत जल मत्स्य पालन अब जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मेघालय और नागालैंड के साथ-साथ पश्चिम बंगाल, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु के पहाड़ी जिलों में तेजी से फल-फूल रहा है। यह पूरा तंत्र मिलकर 5.33 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक के पहाड़ी क्षेत्र को कवर करता है। भारत ने अब तक शीत जल की 278 से अधिक मछली प्रजातियों की पहचान की है, जिससे यह क्षेत्र जैव विविधता के संरक्षण और पहाड़ों के पर्यावरण-अनुकूल विकास के लिए बेहद जरूरी हो गया है।
वर्ष 2024-25 के दौरान देश का कुल मछली उत्पादन लगभग 197.75 लाख टन तक पहुंच गया, जिसमें शीत जल मत्स्य पालन का अंतर्देशीय मछली उत्पादन में लगभग 3 प्रतिशत का योगदान है। देश में शीत जल की मछलियों का कुल उत्पादन अभी लगभग 7,000 टन है। इसमें से केवल ट्राउट मछली का उत्पादन पिछले एक दशक में लगभग 1.8 गुना बढ़कर वर्ष 2024-25 में लगभग 6,000 टन हो गया है।
उत्पादन के मामले में जम्मू और कश्मीर वर्ष 2025-26 में लगभग 3,010 टन उत्पादन के साथ देश का सबसे बड़ा ट्राउट उत्पादक क्षेत्र बनकर उभरा है, जहां कोकरनाग प्रजननालय और 2,000 से अधिक निजी ट्राउट इकाइयों का मजबूत नेटवर्क काम कर रहा है। इसी अवधि में हिमाचल प्रदेश ने 909 ट्राउट उत्पादक किसानों और 1,739 फार्मिंग इकाइयों के सहयोग से लगभग 1,673 टन ट्राउट का उत्पादन किया। उत्तराखंड में वर्ष 2024-25 के दौरान 710 टन ट्राउट और कुल 10,486 टन मछली का उत्पादन रिकॉर्ड किया गया, जिसके मुख्य आधार पिथौरागढ़, बागेश्वर और चमोली जैसे जिलों में स्थापित लगभग 2,500 क्षेत्र हैं।
कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद लद्दाख ने 50 टन उत्पादन का आंकड़ा पार कर लिया है, जहां द्रास में स्थानीय ट्राउट बीज का उत्पादन 30,000 और चोचुट में 80,000 बीज तक पहुंच गया है। पूर्वोत्तर में अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मेघालय और नागालैंड जैसे राज्य प्रजननालयों और ट्राउट पालन का लगातार विस्तार कर रहे हैं, जबकि दक्षिण भारत के केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्य वायनाड, नीलगिरी और उत्तर कन्नड़ के पहाड़ी इलाकों में प्रायोगिक तौर पर इससे संबंधित प्रणालियों को अपना रहे हैं।
इस क्षेत्र ने पहाड़ी राज्यों में रोजगार के अभूतपूर्व अवसर पैदा किए हैं। ठंडे पानी वाले राज्यों में अब तक 23.51 लाख परिवारों को इसके माध्यम से आजीविका मिली है, जबकि 33.78 लाख मछुआरों को बीमा योजनाओं के तहत सुरक्षित किया गया है। अकेले जम्मू और कश्मीर में ही 31,000 से अधिक पंजीकृत मछुआरे और मत्स्य पालक किसान इस व्यवसाय से जुड़े हैं।
भारत सरकार ने अपनी प्रमुख योजनाओं के माध्यम से शीत जल मत्स्य पालन के बुनियादी ढांचे में भारी निवेश किया है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत वर्ष 2020-26 के दौरान देश भर में Rs.21,963.48 करोड़ की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई, जिसमें से विशेष रूप से शीत जल वाले राज्यों के लिए 5,638.76 करोड़ रुपये से अधिक की राशि स्वीकृत की गई। साथ ही मत्स्य पालन, जलीय कृषि बीमा और प्रदर्शन अनुदान के लिए विशेष वित्तीय सहायता दी जा रही है और मछुआरों को किसान क्रेडिट कार्ड की सुविधा भी प्रदान की जा रही है।
देश में मत्स्य पालन को संगठित रूप देने के लिए अनंतनाग (जम्मू-कश्मीर), उधम सिंह नगर (उत्तराखंड), जीरो (अरुणाचल प्रदेश) और मोकोकचुंग (नागालैंड) में एकीकृत एक्वा पार्क बनाए गए हैं। ये पार्क प्रजननालयों, प्रसंस्करण सुविधाओं, शीत गृह प्रणालियों और विपणन सहायता से लैस आधुनिक मत्स्य हब के रूप में काम कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त अनंतनाग, पिथौरागढ़, कुल्लू और कारगिल को विशेष शीत जल मत्स्य पालन क्लस्टर के रूप में अधिसूचित किया गया है। उत्तराखंड ने "उत्तराफिश" ब्रांड के तहत अपनी मछलियों की विशेष ब्रांडिंग शुरू की है, जबकि हिमाचल प्रदेश ने आरएएस तकनीक को अपनाने और 'गोल्डन महासीर' के कृत्रिम प्रजनन में बड़ी सफलता हासिल की है।
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