नयी दिल्ली , मार्च 19 -- केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा है कि भारत की जैव-अर्थव्यवस्था पिछले एक दशक में अभूतपूर्व बढ़ोतरी दर्ज करते हुये एक दशक में 195 अरब डॉलर पहुंच गयी है।
श्री सिंह ने गुरुवार को कहा कि वर्ष 2014 में यह लगभग 10 अरब डॉलर थी और यह 2025 में बढ़कर 195 अरब डॉलर से अधिक हो गई है।
श्री सिंह ने यह बात जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (बीआईआरएसी) के 14वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने इस अवसर पर भारत के जैव प्रौद्योगिकी नवाचार परितंत्र के प्रमुख प्रवर्तक के रूप में बीआईआरएसी की भूमिका का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र ने पिछले वर्ष 17-18 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्ज की है, जो भारत को वैश्विक जैव-प्रौद्योगिकी केंद्र के रूप में स्थापित कर रही है।
श्री सिंह ने कहा कि वैज्ञानिकों, स्टार्टअप्स और उद्यमियों के मजबूत इकोसिस्टम के चलते भारत 2030 तक 300 अरब डॉलर की जैव-अर्थव्यवस्था के लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने जैव-प्रौद्योगिकी को स्वास्थ्य, कृषि, जलवायु समाधान और टिकाऊ विनिर्माण के लिए अहम बताया।
श्री सिंह ने बताया कि रिपोर्ट के अनुसार, देश में 11,800 से अधिक बायोटेक स्टार्टअप इस क्षेत्र को गति दे रहे हैं। साथ ही, जैव-अर्थव्यवस्था का योगदान देश के जीडीपी में करीब पांच प्रतिशत तक पहुंच गया है।
श्री सिंह ने युवा वैज्ञानिकों और खासकर छोटे शहरों से आने वाली प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने पर जोर देते हुए कहा कि नवाचार की संस्कृति ही विकसित भारत की नींव बनेगी। उन्होंने बायो-ई3' नीति (अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार) को सतत जैव-विनिर्माण के लिए महत्वपूर्ण बताते हुये कहा कि यह नीति सटीक चिकित्सा, स्मार्ट प्रोटीन, जलवायु-अनुकूल कृषि और कार्बन कैप्चर जैसी उभरती तकनीकों को बढ़ावा देगी। उन्होंने सरकार द्वारा एक लाख करोड़ रुपये के अनुसंधान, विकास और नवाचार (आरडीआई) कोष का भी जिक्र किया गया। इसके तहत जैव-प्रौद्योगिकी परियोजनाओं को वित्तीय सहायता दी जाएगी, जिससे डीप-टेक और उद्योग-अकादमिक सहयोग को मजबूती मिलेगी।
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