ग्लासगो , अगस्त 02 -- माना जा रहा था कि ग्लासगो भारत की कमज़ोरी को उजागर करेगा। वहाँ न तो शूटिंग थी, न कुश्ती, न बैडमिंटन, न हॉकी और न ही टेबल टेनिस। कई ऐसे खेल जो लंबे समय से भारत के कॉमनवेल्थ मेडल टैली को बढ़ाते रहे थे, वे इस बार प्रोग्राम से गायब थे। आसानी से यह अनुमान लगाया जा सकता था कि भारत को संघर्ष करना पड़ेगा। इसके बजाय, भारत ने खेलों में अपनी एक नई कहानी लिखी।

दशकों से, कॉमनवेल्थ गेम्स एक जाना-पहचाना सिलसिला रहा था। भारतीय निशानेबाज़ घड़ी की सुई की तरह सटीक निशाना लगाते थे, पहलवान कुश्ती में मेडल जीतते थे, वेटलिफ्टर भारी वज़न उठाते थे और तिरंगा इतनी बार लहराता था कि आँकड़े जुटाने वाले व्यस्त रहते थे। ग्लासगो में ऐसी कोई सुविधा नहीं थी। वहाँ एक अलग भारत की ज़रूरत थी।

इसका जवाब शूटिंग रेंज या कुश्ती के मैट से नहीं, बल्कि बॉक्सिंग रिंग से मिला। अगर भारत के अभियान का कोई एक साउंडट्रैक था, तो वह था लेदर ग्लव्स का शरीर से टकराने पर होने वाली धीमी आवाज़। भारतीय मुक्केबाज़ों ने ग्लासगो को अपना निजी अखाड़ा बना लिया और रिकॉर्ड सात गोल्ड और तीन सिल्वर मेडल जीते। पुरुष और महिला मुक्केबाज़ों ने समान आत्मविश्वास के साथ बॉक्सिंग की, जिससे पता चला कि यह कोई गुज़रती हुई 'गोल्डन जेनरेशन' नहीं थी, बल्कि यह बढ़ते हुए टैलेंट पूल और एक ऐसे सिस्टम का नतीजा था जो अब फल देने लगा था।

कभी शूटिंग भारत के लिए कॉमनवेल्थ में मेडल की गारंटी हुआ करती थी। अगर दूसरी जगहों पर मेडल नहीं मिल पाते थे, तो निशानेबाज़ अक्सर स्थिति संभाल लेते थे। ग्लासगो में, बॉक्सिंग ने ज़बरदस्त दबदबे के साथ यह भूमिका निभाई।

एथलेटिक्स ने भी चुपचाप कुछ गिने-चुने स्टार्स पर अपनी पुरानी निर्भरता को छोड़ दिया। नीरज चोपड़ा सबसे बड़े आकर्षण बने रहे, लेकिन अब देश की उम्मीदों का बोझ अकेले उन्हीं के कंधों पर नहीं था। मुरली श्रीशंकर, सर्वेश कुशारे, गुलवीर सिंह, तेजस्विन शंकर और यश वीर सिंह ने यह सुनिश्चित किया कि ट्रैक और फील्ड से लगातार मेडल आते रहें। गुलवीर का दो मेडल जीतने वाला प्रदर्शन शायद इस बदलाव को सबसे अच्छी तरह दिखाता है। भारत अब सिर्फ़ इक्का-दुक्का शानदार प्रदर्शन का जश्न नहीं मना रहा था; वह अपनी गहराई और क्षमता को पहचान रहा था।

फिर पैरा-एथलीट आए, जिन्होंने देश की खेल कहानी में सिर्फ़ एक भावुक फुटनोट बनकर रहने से इनकार कर दिया। शर्मिला धनखड़, दिलीप गावित और सोमन राणा के गोल्ड मेडल किस्मत की मेहरबानी नहीं थे। ये जीत सालों की तैयारी का नतीजा थीं और एक ऐसे स्पोर्ट्स कल्चर को दिखाती हैं जो अब बिना किसी शर्त के बेहतरीन प्रदर्शन को अहमियत देने लगा है। उनके मेडल की अहमियत और उनका महत्व बिल्कुल एक जैसा था।

वहीं, वेटलिफ्टिंग भारत के लिए हमेशा की तरह एक भरोसेमंद पुराने दोस्त की तरह रही। मीराबाई चानू एक बार फिर पोडियम पर सबसे ऊपर पहुंचीं, जबकि लगातार मिले सिल्वर मेडल ने यह साबित कर दिया कि इस खेल में देश की ताकत सिर्फ़ एक चैंपियन तक सीमित नहीं है।

लेकिन, असली कहानी मेडल टैली से कहीं आगे की है। शूटिंग, रेसलिंग, बैडमिंटन और हॉकी के न होने से भारत की मेडल संख्या कम हो सकती थी। इसके बजाय, इसने देश को अपनी उन ताकतों को पहचानने पर मजबूर किया जिन्हें शायद उसने पूरी तरह नहीं समझा था। बॉक्सिंग आगे आई। एथलेटिक्स में परिपक्वता आई। पैरा-स्पोर्ट को अपनी सही जगह मिली। वेटलिफ्टिंग ने अपना शानदार प्रदर्शन जारी रखा।

स्पोर्ट्स के मामले में देश इसी तरह आगे बढ़ते हैं-पुरानी निश्चितताओं से चिपके रहकर नहीं, बल्कि नई निश्चितताएं बनाकर। ग्लासगो के छोटे और सीमित खेलों में एक दिलचस्प बात है। भारत के पारंपरिक मेडल जीतने वाले कई खेलों को हटाकर, इसने अनजाने में ही एक प्रयोग किया। क्या भारत अपने पुराने पसंदीदा खेलों के बिना सफल हो सकता था?इसका जवाब ज़ोरदार 'हां' में था। यह सीख सिर्फ़ एक कॉमनवेल्थ गेम्स से कहीं आगे की है। कोचिंग, स्पोर्ट्स साइंस, ज़मीनी स्तर के प्रोग्राम और एथलीट सपोर्ट में किया गया निवेश अब अलग-अलग खेलों में फैल रहा है। सफलता अब कुछ जाने-पहचाने नामों या खेलों तक सीमित नहीं है। मेडल जीतने का दायरा बढ़ रहा है, और यह किसी भी एक गोल्ड मेडल से ज़्यादा कीमती साबित हो सकता है।

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