वाराणसी , जून 14 -- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सहसरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल नेकहा है कि भारत का वैज्ञानिक इतिहास उतना ही प्राचीन है, जितना उसका सांस्कृतिक इतिहास।

डाॅ. गोपाल विज्ञान भारती के 7वें राष्ट्रीय अधिवेशन के द्वितीय दिवस के प्रथम सत्र में "भारत की विज्ञान परंपरा: पौराणिक से आधुनिक तक" विषय पर उद्बोधन दे रहे थे।

कार्यक्रम का आयोजन काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में किया गया, जिसमें देशभर से आए वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, शोधार्थियों तथा विद्यार्थियों ने भाग लिया।

डॉ. गोपाल ने कहा कि भारत का वैज्ञानिक इतिहास उतना ही प्राचीन है, जितना उसका सांस्कृतिक इतिहास। भारतीय ज्ञान परंपरा में विज्ञान और अध्यात्म परस्पर पूरक रहे हैं। उन्होंने काशी को विश्व की प्राचीनतम जीवित नगरी बताते हुए कहा कि यहां आज भी हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक एवं ज्ञान परंपराएं जीवंत रूप में विद्यमान हैं।

उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन में विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि संगीत, नृत्य, व्याकरण, आयुर्वेद, गणित और दर्शन सहित समस्त ज्ञान-विधाएं विज्ञान के व्यापक स्वरूप का हिस्सा हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल उद्देश्य लोकमंगल, प्रकृति संरक्षण और मानवता का कल्याण रहा है। महेंद्र लाल सरकार द्वारा 1876 में स्थापित भारतीय विज्ञान परिषद के 150 वर्ष पूरे होने वाले हैं और यह यात्रा का नया स्वरूप है, जो धैर्य, लगन और कर्मठता का विषय है। भारतीय ज्ञान सार्वभौम है, इसका उद्देश्य केवल धनोपार्जन नहीं है।

डॉ. कृष्ण गोपाल ने महेंद्रलाल सरकार, जगदीश चंद्र बोस, सी. वी. रमन, शांति स्वरूप भटनागर, विक्रम साराभाई, सतीश धवन, ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, जी. एन. रामचंद्रन, अन्ना मणि, आत्माराम, जानकी अम्माल तथा येल्लाप्रगडा सुब्बाराव जैसे वैज्ञानिकों के जीवन प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय वैज्ञानिकों ने सीमित संसाधनों में भी विश्वस्तरीय उपलब्धियां प्राप्त कीं। उन्होंने कहा कि इन वैज्ञानिकों का जीवन केवल शोध और आविष्कारों तक सीमित नहीं था, बल्कि राष्ट्र निर्माण, नैतिकता, टीम भावना और समाज सेवा के आदर्शों से भी प्रेरित था।

उन्होंने कहा कि विज्ञान मानवता के कल्याण का साधन बने, इसके लिए उसे भारतीय ज्ञान, नैतिक मूल्यों और लोकहित की भावना से जोड़ना आवश्यक है।

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