जयपुर , जून 25 -- राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने कहा है कि इक्कीसवीं सदी को वास्तव में मानवता की सदी बनाना है तो विश्व को युद्ध, धार्मिक कट्टरता और आतंकवाद के मार्ग से हटकर करुणा, सह-अस्तित्व, सेवा और विश्वबंधुत्व के मार्ग पर चलना होगा और भारतीय जीवन दर्शन से ही विश्व में शांति आ सकती है।
श्री देवनानी लेह स्थित लद्दाख विश्वविद्यालय में गुरुवार को आयोजित विश्व शांति और भारतीय दर्शन विश्व शांति में भारत की भूमिका और सांस्कृतिक मूल्य विषयक एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि यही भारत का दर्शन है। यही मानवता का पथ और विश्व शांति का शाश्वत आधार है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में सम्पूर्ण विश्व, युद्ध, आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता, पर्यावरणीय संकट, सामाजिक विषमताओं, मानसिक तनाव और मानवीय मूल्यों के गिरावट जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे समय में भारतीय दर्शन, विश्व में शांति, सह-अस्तित्व और स्थायी विकास का मार्ग दिखाने में सक्षम है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति जीवन जीने की समय दृष्टि है। यह मनुष्य को भौतिक उन्नति के साथ-साथ आत्मिक विकास, सामाजिक समरसता और वैश्विक कल्याण का भी संदेश देती है। भारत ने सदैव सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार मानते हुए 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का संदेश दिया है, जो आज के वैश्विक परिदृश्य में और अधिक प्रासंगिक हो गया है। भारत की सांस्कृतिक चेतना विश्व के लिए आभा की किरण है। सिंधु नदी के तट पर लिखे गये वेदों में विश्व में सभी लोगों के सुखी व स्वस्थ जीवन का मार्ग है।
श्री देवनानी ने भारतीय ऋषियों को रिसर्च स्कॉलर एवं वैज्ञानिक बताते हुए कहा कि भारत के ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्ष पूर्व मानव जीवन, प्रकृति और ब्रह्मांड के गहन रहस्यों पर शोध किया था। उनके द्वारा प्रतिपादित जीवन मूल्य आज भी प्रासंगिक हैं। भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता इसकी समन्वयवादी प्रवृत्ति है, जिसने विभिन्न विचारों, परंपराओं और संस्कृतियों को आत्मसात कर मानवता को एकता का संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि भारत ने कभी विस्तारवाद या वर्चस्ववाद का मार्ग नहीं अपनाया, बल्कि सदैव विश्व कल्याण का विचार रखा।
उन्होंने भगवान बुद्ध को मानवता के पुजारी बताते हुए कहा कि उनके द्वारा करुणा का संदेश दिया गया। भगवान महावीर ने अहिंसा को जीवन का आधार बताया और गुरु नानक देव ने सेवा, समरसता तथा विश्वबंधुत्व का मार्ग दिखाया। यही मूल्य आज विश्व को संघर्ष और हिंसा से बाहर निकाल सकते हैं। श्री देवनानी ने विश्व स्तर पर बढ़ते आतंकवाद पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आतंकवाद मानवता के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। इसके विरुद्ध सम्पूर्ण विश्व समुदाय को एकजुट होकर कार्य करना होगा।
श्री देवनानी ने कहा कि शिकागो में 11 सितंबर 1893 को विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानन्द द्वारा दिया गया "भाइयों और बहनों" का संबोधन केवल एक अभिवादन ही नहीं था, बल्कि यह भारत की प्राचीन सनातन संस्कृति और सार्वभौमिक भाईचारे का एक शक्तिशाली संदेश था। जिसमें विश्व को परिवार मानने का भारतीय दर्शन समाहित था। आतंकवाद किसी एक देश या समाज की समस्या नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए खतरा है। इसके उन्मूलन के लिए वैश्विक सहयोग, परस्पर विश्वास और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति का संदेश जीओ और जीने दो' का है। यह विचार आज के समय में अत्यंत महत्वपूर्ण है, जब विश्व के अनेक भाग संघर्ष और अस्थिरता से जूझ रहे हैं। स्थायी शांति केवल शक्ति संतुलन से नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों, संवाद और आपसी सम्मान से स्थापित की जा सकती है।
श्री देवनानी ने कहा कि योग भारत की अमूल्य धरोहर है। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 11 दिसम्बर 2014 को भारत के योग के प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए 21 जून को अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया। इस प्रस्ताव को विश्व के 177 से अधिक देशों ने समर्थन किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयासों से संयुक्त राष्ट्र द्वारा 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया जाना भारत की सांस्कृतिक विरासत की वैश्विक मान्यता का प्रमाण है। योग शरीर, मन और आत्मा के संतुलन का विज्ञान है तथा मानवता को स्वास्थ्य, शांति और संतुलन का मार्ग प्रदान करता है।
उन्होंने लोगों का आह्वान किया कि वे भारतीय संस्कृति के मूल्यों को आत्मसात करते हुए राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभायें। भारत की युवा शक्ति यदि अपनी सांस्कृतिक विरासत, नैतिक मूल्यों और जान परंपरा से जुड़कर आगे बढ़ेगी तो भारत न केवल विश्वगुरु बनने की दिशा में अग्रसर होगा, बल्कि सम्पूर्ण मानवता को भी नयी दिशा प्रदान करेगा।
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