रांची , मार्च 27 -- झारखंड में भारतीय कृषि जैव प्रौद्योगिकी संस्थान, गढ़खटंगा, राँची में "सतत कृषि एवं खाद्य सुरक्षा के लिए जीनोम एडिटिंग" विषय पर 25 से 27 मार्च तक "जीनोम एडिटिंग उपकरणों के माध्यम से जलवायु सहनशीलता बढ़ाना एवं खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना" परियोजना के अंतर्गत एक राष्ट्रीय मंथन कार्यक्रम आयोजित किया गया।

इस कार्यक्रम में देशभर के प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों ने भाग लिया, जिनमें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्व उपमहानिदेशक डॉ. एस. के. दत्ता , डॉ. एन. के. सिंह (बी. पी. पाल चेयर एवं राष्ट्रीय प्रोफेसर, एनआईपीबी, नई दिल्ली), डॉ. कुलदीप सिंह (प्रमुख, जेनेटिक रिसोर्सेज, आईक्रिसैट), डॉ. ए. विष्णुवर्धन रेड्डी (पूर्व कुलपति, आंगराऊ), डॉ. एन. पी. सिंह (पूर्व निदेशक, आईआईपीआर, कानपुर एवं पूर्व कुलपति, बुंदेलखंड कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, बांदा), डॉ. अरुणव पटनायक (पूर्व निदेशक, आईआईएबी, राँची), डॉ. आर. श्रीनिवासन (पूर्व निदेशक, एनआईपीबी, नई दिल्ली), डॉ. एस. आर. भट्ट (पूर्व प्रोफेसर, एनआईपीबी, नई दिल्ली), डॉ. एच. एस. चावला (पूर्व डीन, पीजीएस, जीबीपीयूएटी, पंतनगर), डॉ. वी. के. खन्ना (पूर्व प्रोफेसर, सीएयू, इम्फाल), डॉ. हरि हर राम (पूर्व प्रोफेसर, जीबीपीयूएटी, पंतनगर), डॉ. वी. रविंद्र बाबू (पूर्व निदेशक, आईआईआरआर, हैदराबाद), डॉ. के. एस. वरप्रसाद (पूर्व निदेशक, आईआईओआर, हैदराबाद), डॉ. एस. बालाचंद्रन (पूर्व प्रमुख, जैवप्रौद्योगिकी, आईआईआरआर, हैदराबाद), डॉ. ए. के. गौर (पूर्व प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, जीबीपीयूएटी, पंतनगर), डॉ. जॉय के. रॉय (वैज्ञानिक-जी, एनएबीआई, मोहाली), डॉ. दिनेश कुमार (प्रधान वैज्ञानिक, आईआईओआर, हैदराबाद), डॉ. कुतुबुद्दीन अली मोल्ला (वरिष्ठ वैज्ञानिक, एनआरआरआई, कटक) तथा डॉ. जितेंद्र गिरी (वैज्ञानिक-छह, एनआईपीजीआर, नई दिल्ली) प्रमुख रूप से शामिल रहे।

मंथन सत्र के दौरान विशेषज्ञों ने जीनोम एडिटिंग अनुसंधान में समग्र पूर्व-प्रयोग योजना की आवश्यकता पर बल दिया, जिसमें सत्यापित लक्षित जीनों की पहचान, प्रभावी पुनर्जनन प्रोटोकॉल का विकास तथा उपलब्ध आनुवंशिक संसाधनों का उपयोग शामिल है। विशेषज्ञों ने पौध ट्रांसफॉर्मेशन प्रणाली से जुड़ी चुनौतियों के समाधान हेतु विभिन्न संस्थानों के बीच सहयोग को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर जोर दिया। साथ ही वैज्ञानिकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों के लिए उन्नत जीनोम एडिटिंग तकनीकों में प्रशिक्षण के माध्यम से क्षमता निर्माण पर भी विशेष बल दिया गया।

विशेषज्ञों ने आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण फसलों एवं गुणों के चयन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता बताई, विशेषकर क्षेत्र-विशिष्ट फसलों जैसे लघु दलहन एवं बागवानी फसलें। पुनर्जनन दक्षता में सुधार हेतु एक्सप्लांट की संख्या बढ़ाने, जीनोटाइप-विशिष्ट प्रतिक्रियाओं का मूल्यांकन करने तथा कल्चर परिस्थितियों के अनुकूलन पर विस्तृत चर्चा की गई।

ट्रांसफॉर्मेशन के क्षेत्र में वायरस-आधारित डिलीवरी, नैनोकण आधारित तकनीकें तथा आरएनपी-आधारित जीनोम एडिटिंग जैसी उभरती विधियों पर विचार-विमर्श किया गया। साथ ही मॉर्फोजेनिक जीनों के उपयोग, चयन प्रणाली के अनुकूलन तथा दृश्य मार्कर आधारित स्क्रीनिंग तकनीकों के प्रयोग की भी सिफारिश की गई। विशेषज्ञों ने जीनोम-संपादित पौधों की स्थिरता एवं प्रभावशीलता सुनिश्चित करने के लिए सटीक घटना विश्लेषण, ऑफ-टारगेट विश्लेषण तथा सत्यापन की आवश्यकता पर बल दिया।

अप्रत्यक्ष पुनर्जनन एवं भ्रूणजनन को स्थिर जीन अभिव्यक्ति प्राप्त करने के लिए विश्वसनीय विधियां बताया गया। अंततः यह निष्कर्ष निकाला गया कि वैज्ञानिक कठोरता, संस्थागत सहयोग एवं कौशल विकास को सुदृढ़ कर जीनोम एडिटिंग तकनीकों का प्रभावी उपयोग फसल सुधार कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण परिवर्तन ला सकता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. सुजय रक्षित, निदेशक, भा.कृ.अनु.प.-भारतीय कृषि जैवप्रौद्योगिकी संस्थान ने की। उन्होंने कृषि क्षेत्र की उभरती चुनौतियों के समाधान तथा खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में उन्नत जीनोम एडिटिंग तकनीकों के महत्व पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम के आयोजन एवं योजना का नेतृत्व डॉ. विजय पाल भदाना, संयुक्त निदेशक (अनुसंधान) द्वारा किया गया, जिन्होंने वर्तमान कृषि-पर्यावरणीय परिदृश्य में जीनोम एडिटिंग की प्रासंगिकता को रेखांकित किया।इस कार्यक्रम में वैज्ञानिकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी रही, जिससे यह एक ज्ञानवर्धक एवं प्रभावशाली वैज्ञानिक आयोजन सिद्ध हुआ।

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