शिमला , अक्टूबर 29 -- हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला स्थित देश के सर्वोच्च शिक्षा संस्थानों में शामिल भारतीयउच्च अध्ययन संस्थान, राष्ट्रपति निवास में गुरुवार को 'भारतीय ज्ञान प्रणाली एवं एआई' विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ।
इसका उद्देश्य भारतीय ज्ञान प्रणालियों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को कई नजरिये से देखना और मौजूदा तकनीकी विकास में भारतीय दार्शनिक, नैतिक, भाषायी, पर्यावरणीय और सांस्कृतिक परंपराओं की प्रासंगिकता पर विचार-विमर्श करना है।
उद्घाटन सत्र में संगोष्ठी के संयोजक एवं बेनेट विश्वविद्यालय के टाइम्स स्कूल ऑफ मीडिया के डीन डॉ. सुमित नरूला ने संगोष्ठी की विषयवस्तु और उसके प्रमुख उद्देश्यों का परिचय दिया। उन्होंने भारतीय ज्ञान प्रणालियों और एआई के बीच संवाद की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए इस विषय के बहुविषयक महत्त्व को सामने रखा।
उद्घाटन सत्र के बाद संगोष्ठी के पहले दिन तीन अकादमिक सत्र आयोजित किए गए, जिनमें पर्यावरणीय स्थिरता, कला एवं सांस्कृतिक विरासत तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नैतिकता से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श हुआ।
आईआईटी पटना की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. प्रियंका त्रिपाठी ने ऑनलाइन माध्यम से मुख्य वक्तव्य रखा। उनके वक्तव्य ने संगोष्ठी की केंद्रीय विषयवस्तु के अंतर्गत भारतीय ज्ञान प्रणालियों और उभरती प्रौद्योगिकियों के परस्पर संबंधों पर अकादमिक विमर्श के लिए आधार प्रदान किया।
बेनेट विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति एवं संगोष्ठी के मुख्य अतिथि प्रो. (डॉ.) राज सिंह ने अपने संबोधन भारतीय ज्ञान प्रणालियों और आधुनिक तकनीकी विकास के बीच संबंधों पर विचार-विमर्श के लिए उद्घाटन सत्र को आगे बढ़ाया।
डॉ. नरूला की अध्यक्षता में आयोजित प्रथम सत्र में पर्यावरणीय नैतिकता, प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व तथा भारतीय ज्ञान प्रणालियों की समकालीन प्रासंगिकता पर चर्चा हुई। आईआईएम शिलांग की प्रोफेसर डॉ. नीलम रानी ने भारतीय ज्ञान प्रणालियों और कौटिल्य के अर्थशास्त्र के संबंध पर व्याख्यान दिया।
दिल्ली विश्वविद्यालय के श्यामा प्रसाद मुखर्जी कॉलेज फॉर विमेन के डॉ. संजीव कुमार ने गांधीवादी न्यासिता तथा अद्वैत वेदांत में 'स्वामित्वहीनता' की अवधारणा के संदर्भ में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वामित्व के प्रश्न पर विचार प्रस्तुत किए। डॉ. अन्वेषा शर्मा की अध्यक्षता में आयोजित दूसरे सत्र में भारतीय कला, पांडुलिपियों, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की संभावनाओं तथा उससे जुड़े नैतिक प्रश्नों पर चर्चा हुई।
ऋषिहुड विश्वविद्यालय, सोनीपत के क्षितिज आनंद ने सांस्कृतिक विरासत के डिजिटल अभिलेखीकरण, पुनर्स्थापन और आभासी पुनर्निर्माण पर प्रस्तुति दी। एमिटी विश्वविद्यालय राजस्थान की प्रोफेसर एवं एमिटी लॉ स्कूल की निदेशक डॉ. कोमल औदिच्य ने पांडुलिपियों, ताड़पत्र ग्रंथों, हस्तशिल्प और दृश्य परंपराओं के संरक्षण में एआई की भूमिका पर ऑनलाइन व्याख्यान दिया।
केंद्रीय विश्वविद्यालय पंजाब की सुश्री प्रांजलि सिंह ने सांस्कृतिक विरासत में एआई के नैतिक उपयोग और भारतीय ज्ञान प्रणालियों के संदर्भ में सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण पर शोध-पत्र प्रस्तुत किया। किशनगंज, बिहार के अकादमिक शोधकर्ता ज़ैनुल आबिदीन ने बदलती रचनात्मक अर्थव्यवस्था में पारंपरिक कलाकारों और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण से जुड़े प्रश्नों पर अपनी प्रस्तुति दी।
दिन के तीसरे सत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के नैतिक पक्षों तथा भारतीय दार्शनिक परंपराओं की प्रासंगिकता पर विमर्श हुआ। टाइम्स स्कूल ऑफ मीडिया, बेनेट विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. तिलक झा की अध्यक्षता में आयोजित इस सत्र में धर्म, अहिंसा, लोकसंग्रह और विवेक जैसी अवधारणाओं के माध्यम से उत्तरदायी एआई की संभावनाओं का अध्ययन किया गया।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इनसॉल्वेंसी प्रोफेशनल्स ऑफ आईसीएआई के सिद्धेश्वर शुक्ल ने इन भारतीय नैतिक अवधारणाओं को एआई नैतिकता के ढांचे के रूप में समझने पर ऑनलाइन व्याख्यान दिया। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रामनाथ झा ने वेदांत, बौद्ध, जैन, न्याय और सांख्य दर्शन के आलोक में एल्गोरिद्मिक पक्षपात, निष्पक्षता और जवाबदेही के प्रश्नों का विश्लेषण किया।
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के शोधार्थी जयदेव सिंह ने धर्म, विवेक और एल्गोरिद्मिक पक्षपात के संदर्भ में उत्तरदायी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए भारतीय ज्ञान प्रणाली आधारित ढांचे पर शोध-पत्र प्रस्तुत किया। हल्दिया गवर्नमेंट कॉलेज, पश्चिम बंगाल के डॉ. निजामुद्दीन अहमद ने भारतीय ज्ञान प्रणालियों के माध्यम से नैतिक एआई की पुनर्कल्पना पर अपनी प्रस्तुति दी।संगोष्ठी के दूसरे दिन, 30 अक्टूबर को, आयुर्वेद, योग एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से स्वास्थ्य और कल्याण; भारतीय भाषायी परंपराओं एवं भाषा प्रौद्योगिकी तथा पाठ्यक्रम, नीति और क्षमता निर्माण जैसे विषयों पर अकादमिक सत्र आयोजित किए जाएंगे। समापन सत्र में संगोष्ठी की प्रमुख चर्चाओं और निष्कर्षों को प्रस्तुत किया जाएगा।
यह राष्ट्रीय संगोष्ठी भारतीय ज्ञान प्रणालियों और आधुनिक तकनीकी नवाचार के बीच संवाद को प्रोत्साहित करने का मंच प्रदान कर रही है। इसका व्यापक उद्देश्य ऐसे तकनीकी भविष्य की संभावनाओं पर विचार करना है जिसमें नवाचार के साथ मानवीय मूल्य, सामाजिक समावेशन, सांस्कृतिक निरंतरता और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व भी समान रूप से महत्वपूर्ण हों।
संगोष्ठी के औपचारिक शुभारंभ से पूर्व भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के राष्ट्रीय फेलो प्रो. सचिदानंद मोहंती के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए उपस्थित विद्वानों, अतिथियों और प्रतिभागियों ने दो मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। प्रो. मोहंती का 27 अक्टूबर 2026 को निधन हो गया था।
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