भागलपुर , अक्टूबर 29 -- बिहार के भागलपुर में आयोजित 22 दिवसीय 'युवा अभिव्यक्ति कार्यशाला श्रृंखला' में मंजूषा जैसी पारंपरिक लोककलाओं में नए प्रयोगों के साथ युवाओं को रोजगारपरक कौशल प्रदान करने पर जोर दिया गया।

इस कार्यशाला में सिक्की और विभिन्न घासों से मंजूषा चित्रशैली में कलाकृतियां तैयार करने, झाँपी पर मंजूषा चित्रांकन की परंपरा को पुनर्जीवित करने तथा स्क्रीन प्रिंटिंग के माध्यम से युवाओं को स्वरोजगार के अवसरों से जोड़ने की पहल की गई। गुरुवार को भागलपुर संग्रहालय में आयोजित समापन समारोह में प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए।

राज्य सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग और जिला प्रशासन के सहयोग से आयोजित इस कार्यशाला का उद्देश्य पारंपरिक लोककलाओं का संरक्षण, उनमें नए प्रयोगों को प्रोत्साहन, युवाओं का कौशल विकास तथा उन्हें रोजगार और स्वरोजगार के अवसरों से जोड़ना था।

समापन समारोह के अवसर पर कार्यशाला के दौरान तैयार की गई कलाकृतियों की प्रदर्शनी लगाई गई, जिसका डॉ. मनजीत सिंह किनवार, दिलीप कुमार और अंकित रंजन सहित वरिष्ठ कलाकारों एवं कला प्रेमियों ने प्रदर्शनी का अवलोकन किया।

कार्यशाला का प्रमुख आकर्षण सिक्की और विभिन्न प्रकार की स्थानीय घासों से कलाकृतियों का निर्माण तथा उनमें मंजूषा चित्रशैली का प्रयोग रहा। प्रशिक्षक दिलीप कुमार के नेतृत्व में प्रतिभागियों ने सिक्की के अलावा मुंज, दूब, धान के पौधों से प्राप्त सामग्री और अन्य स्थानीय घासों का उपयोग कर विविध कलात्मक वस्तुएं तैयार कीं। घासों की प्राकृतिक बनावट, रंग और संरचना को कलात्मक रूप देते हुए मंजूषा कला के पारंपरिक रूपांकनों को नए माध्यम पर उकेरने का प्रयास किया गया।

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