भदोही , मई 12 -- उत्तर प्रदेश के भदोही जिले में स्थित प्राचीन भद्रसेन किले के सात कुओं का रहस्य आज भी पुरातत्वविदों और इतिहासकारों के लिए पहेली बना हुआ है। गुप्त सुरंगों और अद्भुत जल प्रबंधन प्रणाली से जुड़े ये कुएं राजा भद्रसेन के शासनकाल की भव्यता और रहस्यमयी स्थापत्य कला की झलक प्रस्तुत करते हैं। जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर काशी और प्रयाग के मध्य वरुणा तथा बसुही नदियों के संगम क्षेत्र में वाराणसी जिले से सटे सरावां गांव में स्थित भद्रसेन किले के खंडहर और सात कुएं वर्षों से लोगों की जिज्ञासा का केंद्र बने हुए हैं। स्थानीय लोककथाओं और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इन कुओं का निर्माण गुप्त सुरंगों और विशेष जल प्रबंधन व्यवस्था के लिए किया गया था। किंवदंतियों में कहा जाता है कि सात कुओं में से एक कुआं ऐसी सुरंग से जुड़ा था, जिसका संबंध पाताल लोक अथवा नागलोक से माना जाता था।

भद्रसेन किले का इतिहास उज्जैन के राजा विक्रमादित्य से भी जोड़ा जाता है। लोकश्रुतियों के अनुसार, राजा विक्रमादित्य ने ब्रह्महत्या के श्राप से मुक्ति पाने के लिए माता भद्रकाली की आराधना की थी और इन कुओं का उपयोग उनकी गुप्त साधनाओं में किया जाता था।

मान्यता यह भी है कि इन कुओं के जल में औषधीय गुण मौजूद थे। कुछ कथाओं में इन्हें अमृत तुल्य बताया गया है, जिसका उपयोग रोगों के उपचार अथवा मृत व्यक्तियों को जीवित करने जैसी चमत्कारी शक्तियों से जोड़ा जाता रहा है। प्राचीन संरचनाओं और खंडहरों के रूप में मौजूद यह किला भारतीय संस्कृति, लोककथाओं और रहस्यमयी इतिहास का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि लगभग डेढ़ दशक पूर्व पुरातत्व विभाग की एक टीम ने किले के खंडहरों का सर्वेक्षण किया था, लेकिन अब तक वहां छिपे रहस्यों और संभावित प्राचीन संपदा के बारे में कोई ठोस निष्कर्ष सामने नहीं आ सका है।

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