भदोही , अगस्त 10 -- उत्तर प्रदेश के भदोही जिले में सावन माह शुरू होते ही शिवालयों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी है। श्रावण मास के तिहरे सोमवार को सड़कों और राजमार्गों पर गेरुआ वस्त्रधारी कांवड़ियों की आवाजाही अचानक बढ़ गई है।

जिला मुख्यालय से लगभग 12 किलोमीटर दूर गंगा तट पर स्थित पौराणिक बाबा तिलेश्वरनाथ मंदिर भी कांवरियों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। स्थानीय परंपरा के अनुसार तिलेश्वरनाथ मंदिर का संबंध महाभारत काल से माना जाता है। मान्यता है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान यहां शिवलिंग की स्थापना की थी। सावन के महीने में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचकर भगवान शिव का जलाभिषेक और पूजा-अर्चना करते हैं।

इस मंदिर से जुड़ी एक प्रमुख स्थानीय मान्यता शिवलिंग के रंग बदलने को लेकर है। श्रद्धालुओं के अनुसार गर्मी के मौसम में शिवलिंग सफेद, वर्षा अथवा सामान्य मौसम में गेहुएं रंग का और सर्दियों में काले रंग का दिखाई देता है। एक अन्य मान्यता के मुताबिक वर्ष में एक बार शिवलिंग की बाहरी पपड़ी उतरती है और इसके बावजूद इसका आकार कम होने के बजाय तिल के बराबर बढ़ जाता है।

हालांकि, शिवलिंग के मौसम के अनुसार रंग बदलने या उसके आकार में वृद्धि होने के इन दावों की वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इन्हें स्थानीय धार्मिक आस्था और परंपरा का हिस्सा माना जाता है।

गंगा से जल लेकर शिवालयों तक पहुंचने वाले कांवड़िए निर्धारित नियमों और धार्मिक परंपराओं का पालन करते हुए भगवान शिव का अभिषेक करते हैं। कांवड़ यात्रा को लेकर विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग पौराणिक मान्यताएं प्रचलित हैं। कहीं भगवान राम को पहला कांवड़िया माना जाता है तो कहीं रावण अथवा श्रवण कुमार से इसका संबंध जोड़ा जाता है।

कांवड़ यात्रा को आत्म संयम, श्रद्धा और तपस्या की यात्रा के रूप में भी देखा जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि विधि-विधान और नियमों का पालन करते हुए शिवलिंग पर जल अर्पित करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं तथा सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।

सावन और महाशिवरात्रि के अवसर पर तिलेश्वरनाथ मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना होती है और इन अवसरों पर श्रद्धालुओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जाती है।

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