कानपुर , मार्च 03 -- उत्तर प्रदेश की कानपुर पुलिस ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर लोन दिलाने के नाम पर संचालित एक संगठित गिरोह का पर्दाफाश किया गया है। यह गिरोह लोगों को लोन स्वीकृत कराने का झांसा देकर उनके पैन कार्ड, आधार कार्ड एवं आवासीय विवरण प्राप्त कर लेता था। प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर उनके नाम से फर्जी फर्म/एंटरप्राइज स्थापित कर जीएसटी पंजीकरण कराया जाता था तथा बैंक खाते खोले जाते थे । पुलिस आयुक्त रघुबीर लाल ने मंगलवार को यहां पत्रकारों को बताया कि शुरुआती जांच में अब तक 38 बोगस कंपनियों का पता चला है, जिनके माध्यम से लगभग 250 करोड़ रुपये का लेन-देन किया गया है। इस प्रकरण में दो आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है तथा पांच आरोपी फरार हैं, जिनकी तलाश जारी है।

गिरफ्तार अभियुक्तों में कपिल मिश्रा (शैक्षिक योग्यता 12वीं, आईटीआई) और राज उर्फ अमर दीप (12वीं) शामिल हैं। गिरफ्तारी के दौरान 30 मोबाइल फोन, फर्जी सिम कार्ड, 52 चाबियां, 12 फर्मों के साइन बोर्ड, विभिन्न बैंकिंग दस्तावेज, 15 चेकबुक, मोहर, एटीएम कार्ड, किरायानामा, फर्म पंजीकरण दस्तावेज, डिजिटल उपकरण तथा 1.5 करोड़ रुपये की फ्रीज धनराशि से संबंधित साक्ष्य बरामद किए गए।

उन्होने बताया कि जांच के दौरान "पार्वती एंटरप्राइज" नामक फर्म एक गरीब रिक्शा चालक के नाम पर फर्जी रूप से पंजीकृत पाई गई । संबंधित व्यक्ति को इस फर्म और उसके बैंक खाते की जानकारी तक नहीं थी। इस खाते में लगभग 1.50 करोड़ रुपये की राशि फ्रीज कराई गई है। इसी प्रकार पार्वती एंटरप्राइज से जुड़ी कुल 12 अन्य फर्मों का संचालन किया जा रहा था तथा दो अन्य फर्मों के साथ भी लेन-देन किया जा रहा था ।

श्री लाल ने बताया कि शिकायतकर्ता अनुराग वर्मा से कपिल मिश्रा द्वारा उसकी बहन की शादी के लिए लोन दिलाने के नाम पर दस्तावेज लिए गए थे । उसे लगातार डेढ़ माह तक यह कहकर टालते रहे कि लोन प्रक्रिया में है, जबकि उसके नाम से फर्म खोलकर जीएसटी पंजीकरण कराया जा चुका था और एचडीएफसी बैंक में खाता संचालित किया जा रहा था । खाते में धनराशि का आवागमन एवं निकासी की जा रही थी तथा जीएसटी चोरी से संबंधित लेन-देन किया जा रहा था ।

आरोपियों द्वारा फर्म पंजीकरण के दौरान ओटीपी प्राप्त करने के लिये मोबाइल फोन अपने पास रखे जाते थे । अब तक लगभग 30 मोबाइल फोन एवं 52 चाबियां बरामद की गई हैं, जिससे अनेक फर्जी फर्मों के संचालन की पुष्टि हुई है। शिकायतकर्ता को जब संदेह हुआ कि उसके दस्तावेजों का दुरुपयोग हो रहा है, तब उसने पुलिस से संपर्क किया ।

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