नागपुर , जुलाई 14 -- बॉम्बे उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ ने किसी व्यक्ति के 'भूल जाने के अधिकार' को निजता का मौलिक अधिकार मानते हुए एक व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द होने के बाद ऑनलाइन अदालती रिकॉर्ड से उसका नाम और निजी विवरण हटाने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी फाल्के और न्यायमूर्ति निवेदिता मेहता की पीठ ने टिप्पणी की कि जब किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक आरोप निरस्त कर दिये जाते हैं, तो ऐसी कार्यवाहियों के विवरण को इंटरनेट पर स्थायी रूप से उपलब्ध रहने देने में कोई सर्वोपरि जनहित नहीं बचता है।
अदालत ने यह आदेश 37 वर्षीय एक व्यक्ति के दायर याचिका पर पारित किया, जिसमें बॉम्बे उच्च न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड अदालती आदेशों और फैसलों की डिजिटल प्रतियों से उसकी पहचान छिपाने की मांग की गयी थी।
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि नागपुर पुलिस ने 2017 में उसके खिलाफ एक आपराधिक मामला दर्ज किया था। बाद में, पक्षों के बीच विवाद सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझ जाने के बाद, उसने प्राथमिकी रद्द कराने के लिए उच्च न्यायालय का रुख किया। न्यायालय ने उसकी याचिका स्वीकार कर ली और उसी वर्ष आपराधिक कार्यवाही समाप्त कर दी। मामला समाप्त होने के बावजूद कार्यवाही का विवरण ऑनलाइन बना रहा। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि नौकरी की जांच और शैक्षणिक पृष्ठभूमि के सत्यापन के दौरान अक्सर यह रिकॉर्ड सामने आ जाते थे, जिससे उसके करियर के अवसरों पर असर पड़ रहा था और सामाजिक शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा था।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि ऐसी जानकारी का सार्वजनिक रूप से लगातार उपलब्ध रहना उसकी निजता के अधिकार का उल्लंघन है और उसने सार्वजनिक रूप से सुलभ न्यायिक रिकॉर्ड से अपनी पहचान हटाने का निर्देश देने की मांग की।
पीठ ने याचिका स्वीकार करते हुए पीठ ने माना कि न्यायिक जानकारी में पारदर्शिता और सार्वजनिक पहुंच लोकतांत्रिक व्यवस्था महत्वपूर्ण पहलू हैं, लेकिन इन्हें किसी व्यक्ति की निजता, गरिमा और प्रतिष्ठा के अधिकार के साथ संतुलित किया जाना चाहिए।
यह देखते हुए कि पक्षों के बीच मामला सुलझ चुका था और आपराधिक मामला पहले ही रद्द कर दिया गया था, न्यायालय ने याचिकाकर्ता के अनुरोध को उचित पाया और उच्च न्यायालय रजिस्ट्री को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रिकॉर्ड से उसका नाम और पहचान संबंधी विवरण हटाने का निर्देश दिया।
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