मुंबई , अक्टूबर 19 -- बॉम्बे उच्च न्यायालय ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेंद्र कुमार के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान लोगों को अवैध रूप से हिरासत में रखने और पुलिस की बर्बरता के आरोपों पर महाराष्ट्र सरकार को अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही न्यायालय ने यह भी कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से आम जनता को परेशानी नहीं होनी चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश एमसी त्रिपाठी और न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना की पीठ ने सोमवार को एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि नागरिकों को विरोध करने का अधिकार तो है लेकिन वे कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा नहीं कर सकते। न्यायालय ने प्रदर्शनकारियों की पहचान की जांच किए बिना पुलिस कार्रवाई के खिलाफ संरक्षण दिए जाने की मांग पर विचार करने से इनकार कर दिया और यह कहा कि महाराष्ट्र पुलिस ने संयम बरता है।

उच्च न्यायालय में यह कार्यवाही वकील सागर देवरे द्वारा दायर याचिका और दिल्ली में होने वाले प्रदर्शनों के समर्थन में मुंबई में हुए प्रदर्शन से संबंधित हस्तक्षेप आवेदन से शुरू हुई। स्थानीय निवासियों, जिनका प्रतिनिधित्व वकीलों आरवी गोविलकार और मिहिर गोविलकार ने किया, ने आंदोलन से हुई असुविधा की शिकायत की थी।

कथित रूप से हिरासत में लिए गए चार लोगों की ओर से पेश वकील गायत्री सिंह ने दावा किया कि प्रदर्शनकारियों को पूरे दिन के लिए पुलिस थानों में रखा गया और बाद में उन्हें नज़रबंद कर दिया गया। वकील मिहिर देसाई ने दो हलफनामों का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि लोगों को उनके घरों से उठाया गया था। उन्होंने एक ऐसी घटना का भी उल्लेख किया जिसमें पुलिस ने कथित तौर पर एक उबर टैक्सी को रोका, उसके चालक को वहां से जाने के लिए कहा और एक महिला यात्री को पुलिस स्टेशन ले गई। एक अन्य व्यक्ति ने आरोप लगाया कि उनकी दो बेटियों को हिरासत में लिया गया था।

महाधिवक्ता मिलिंद साठे ने लोगों को हिरासत में लिए जाने की बात से इनकार किया। उन्होंने कहा कि पुलिस ने केवल उन रास्तों को खाली कराया, जिन्हें कथित तौर पर प्रदर्शनकारियों ने ऐतिहासिक अगस्त क्रांति मैदान के पास अवरुद्ध कर रखा था।

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