मुंबई , अप्रैल 29 -- बॉम्बे उच्च न्यायालय ने 2013 में महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति (एमएएनएस) के संस्थापक नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के मामले में दोषी ठहराये गये शरद कलस्कर की जमानत याचिका बुधवार को मंजूर कर ली।
न्यायमूर्ति अजय गडकरी और न्यायमूर्ति आरआर भोंसले की पीठ ने यह याचिका स्वीकार कर ली। विस्तृत आदेश की प्रतीक्षा है।इससे पहले विशेष अदालत के न्यायाधीश पीपी जाधव ने 10 मई 2024 को कलस्कर को सजा सुनायी थी। कलस्कर ने इसे चुनौती दी थी और अपील पर अंतिम सुनवाई होने तक अंतरिम जमानत की मांग की थी।
श्री दाभोलकर ने अंधविश्वासों, पाखंडी बाबाओं, तांत्रिकों आदि के खिलाफ व्यापक मुहिम छेड़ी थी। इसके कारण उन्हें दक्षिणपंथी संगठनों सहित कई दकियानूसी लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा था। बीस अगस्त 2013 को पुणे में सुबह की सैर के दौरान मोटरसाइकिल सवार दो हमलावरों ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी थी। जांचकर्ताओं ने आरोपियों के तार 'सनातन संस्था' से जुड़े होने का दावा किया है। उनकी हत्या तर्कवादियों और कार्यकर्ताओं की हाई-प्रोफाइल हत्याओं की शृंखला में पहली वारदात थी, जिसमें फरवरी 2015 में कोल्हापुर में गोविंद पानसरे, अगस्त 2015 में धारवाड़ में कन्नड़ विद्वान एम.एम. कलबुर्गी और सितंबर 2017 में बेंगलुरु में पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या शामिल है।
इस बीच श्री दाभोलकर की बेटी मुक्ता दाभोलकर ने कुछ आरोपियों को बरी किये जाने को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में एक अलग अपील दायर की है। उनकी याचिका में दक्षिणपंथी समूहों के सदस्यों से जुड़ी एक व्यापक साजिश का आरोप लगाया गया है और तर्क दिया गया है कि निचली अदालत ने अहम सबूतों पर पर्याप्त रूप से गौर नहीं किया। याचिका में आरोप लगाया गया कि सत्र न्यायालय उन सबूतों का सही मूल्यांकन करने में विफल रहा, जो दर्शाते हैं कि आरोपी ऐसे संगठनों का विरोध करने पर श्री दाभोलकर को खामोश करने की साजिश में शामिल थे। याचिका में दावा किया गया कि बरी किये गये तीनों आरोपी भी उसी संगठन से जुड़े हुए हैं।
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