मुंबई , अप्रैल 22 -- काफी समय से लंबित 2006 के मालेगांव विस्फोट मामले में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने बुधवार को चार आरोपियों को अपर्याप्त सबूतों का हवाला देते हुए बरी कर दिया।

यह फैसला मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति श्याम चांडक की खंडपीठ ने सुनाया, जो लगभग दो दशकों से न्यायिक जांच के दायरे में रहे इस मामले में एक अहम मोड़ लेकर आया है।

अदालत ने पाया कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के सबूत आवश्यक कानूनी मानकों पर खरे नहीं उतरते। इसके बाद चारों आरोपियों राजेंद्र चौधरी, मनोहर राम सिंह नरवरिया, धन सिंह और लोकेश शर्मा को राहत दी गयी।

कार्यवाही के दौरान, एनआईए ने दलील दी कि कई गवाहों ने आरोपियों के खिलाफ गवाही दी है। हालांकि, अदालत ने गौर किया कि ऐसी गवाहियां अपर्याप्त थीं और उनमें ठोस कमी थी। यह मामला आठ सितंबर, 2006 का है, जब मालेगांव में हुए सिलसिलेवार विस्फोटों में 31 लोगों की जान चली गयी थी और 312 लोग घायल हुए थे। मुख्य विस्फोट हमीदिया मस्जिद के पास स्थित बड़ा कब्रिस्तान में हुआ था। इसके अलावा मुशावरत चौक पर भी धमाका हुआ था। 8 सितंबर 2006 को शुक्रवार था और इस दिन शब-ए-बारात भी था। विस्फोट तब हुआ था, जब जुमे की नमाज के बाद लोग कब्रिस्तान में दुआ करने के लिए जमा हुए थे। इस घटना के बाद अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था।

शुरुआत में महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) ने जांच की थी। इसमें 12 व्यक्तियों को गिरफ्तार किया था और दिसंबर 2006 में आरोप पत्र दायर किया था।

बाद में फरवरी 2007 में जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को स्थानांतरित कर दी गयी। इसके बाद अंततः इसे एनआईए को सौंप दिया गया। एनआईए ने आगे की जांच की और एक पूरक आरोप पत्र दायर किया, जिसमें इन चारों व्यक्तियों सहित अतिरिक्त आरोपियों के नाम शामिल किये गये थे। इससे पहले, नौ मुस्लिम आरोपियों को क्लीन चिट दिये जाने के बाद एनआईए ने इन चार व्यक्तियों को गिरफ्तार किया था।

आरोपियों ने सबसे पहले निचली अदालत में बरी करने की गुहार लगायी थी, जहां उनकी याचिका का एनआईए और धमाके के पीड़ितों, दोनों ने जमीयत उलेमा महाराष्ट्र (अरशद मदनी) कानूनी सहायता समिति के माध्यम से विरोध किया था। ट्रायल कोर्ट ने उनकी डिस्चार्ज याचिका खारिज कर दी थी और अभियोजन पक्ष के गवाहों को समन जारी करते हुए मुकदमे की कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया था।

इस आदेश को चुनौती देते हुए आरोपी उच्च न्यायालय पहुंचे। जनवरी 2026 में, अदालत ने अपील दायर करने में 49 दिनों की देरी को माफ कर दिया और इसे एनआईए अधिनियम के तहत एक वैधानिक अपील के रूप में मान्यता दी। अदालत ने यह मानते हुए कि हस्तक्षेप के लिए प्रथम दृष्टया मामला बनता है, ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर भी रोक लगा दी थी।

उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान पीठ ने विशेष रूप से एनआईए से उन चश्मदीद गवाहों की पहचान करने को कहा, जिन्होंने सीधे तौर पर आरोपियों को संलिप्त बताया था। एजेंसी ने स्वीकार किया कि कोई चश्मदीद गवाह उपलब्ध नहीं है, लेकिन उन्होंने अपनी बात पर कायम रहते हुए कहा कि आरोपी एक बड़ी आपराधिक साजिश का हिस्सा थे। हालांकि, अदालत ने आरोपों को बरकरार रखने के लिए इस दलील को अपर्याप्त पाया।

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