छत्रपति संभाजीनगर , मई 08 -- बांबे उच्च न्यायालय की औरंगाबाद बेंच ने महाराष्ट्र सरकार के उस फैसले पर यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया है, जिसमें औसा शहर में चार विकास परियोजनाओं के लिए आवंटित राशि को रद्द करने और उसका रुख बदलने का निर्णय लिया गया था।

न्यायाधीश विभा कंकनवाड़ी और न्यायाधीश अजीत बी. कडेथंकर की खंडपीठ ने यह अंतरिम आदेश सरकार के एक शुद्धिपत्र को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। इस शुद्धिपत्र के ज़रिए औसा नगर परिषद को पहले ही जारी किए जा चुके राशि का इस्तेमाल किसी अन्य उद्देश्य के लिए करने की मांग की गई थी।

यह विवाद "नगर परिषद के लिए विकास कार्य" योजना के तहत स्वीकृत चार बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से संबंधित है। इन परियोजनाओं में विस्तारित बस्तियों का विद्युतीकरण, एक वाणिज्यिक कॉम्प्लेक्स और सार्वजनिक पार्क का निर्माण, पूरे शहर में सीसीटीवी निगरानी प्रणाली की स्थापना, और महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम (एमआईडीसी) क्षेत्र को जोड़ने वाली सड़क का विकास शामिल था।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार राज्य सरकार ने चार फरवरी को एक शुद्धिपत्र जारी किया था, जिसमें स्वीकृत परियोजनाओं को रद्द कर दिया गया और उनकी जगह चुनिंदा वार्डों में आंतरिक सड़कों और नालियों सहित अन्य सिविल कार्य शुरू किए गए।

सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि राज्य सरकार की यह कार्रवाई मनमानी है और यह "सत्ता का दुरुपयोग" है। यह दलील दी गई कि एक बार जब धनराशि जारी कर दी गई और नगर परिषद के खाते में जमा हो गई, तो वह महाराष्ट्र नगर परिषद अधिनियम, 1965 की धारा 90 के तहत "नगर परिषद निधि" बन गयी, इसलिए, उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना इसे एकतरफा रूप से वापस नहीं लिया जा सकता है और न ही इसका पुनर्वितरण किया जा सकता है।

न्यायालय को बताया गया कि नगर परिषद ने मूल परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण और तकनीकी स्वीकृतियों पर पहले ही 27 लाख रुपये से लेकर 46 लाख रुपये तक खर्च कर दिए थे। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि इस चरण पर कार्यों को रद्द करने से सरकारी खजाने को वित्तीय नुकसान होगा।

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