मुंबई , सितंबर 07 -- बॉम्बे उच्च न्यायालय ने मुंबई पत्तन प्राधिकरण (एमपीए) की उस विवादित योजना को खारिज कर दिया है जिसके तहत वहां काम कर रहे सैंकड़ों कारोबारियों , व्यापारियों और परिवारों पर 2012 से 2022 तक के एक दशक के भारी-भरकम और पिछली तारीख से लागू किराया बिल थोपे जा रहे थे।

लंबे समय से कोलाबा से लेकर सेवरी तक के इलाकों में रह रहे किराएदार अतिरिक्त किराए और करोड़ों रुपये के बकाया की अचानक मांग को लेकर परेशान थे। एमपीए ने नये बाज़ार मूल्य फ़ार्मूलों का इस्तेमाल कर पिछली तारीख से दरें बढ़ाने की कोशिश की थी। लेकिन उच्च न्यायालय ने दखल देते हुए साफ़ कर दिया कि कोई सरकारी संस्था सिर्फ़ लोगों से ज़्यादा से ज़्यादा पैसा वसूलने के लिए लालची मकान-मालिक की तरह व्यवहार नहीं कर सकती।

उच्च न्यायालय ने एमपीए की पिछली तारीख से लागू किराया बढ़ोतरी को सख्ती से रद्द कर दिया है और साफ़ चेतावनी दी है कि वैधानिक सार्वजनिक संस्थाएं "मुनाफ़ाखोरी और मनमाना किराया वसूलने" का काम नहीं कर सकतीं।

न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति मंजूषा देशपांडे की खंडपीठ ने यह अहम फ़ैसला सुनाया। इस फ़ैसले ने उन कई राजपत्र अधिसूचना और वसूली नोटिस को अमान्य कर दिया, जिनके ज़रिए किराएदारों पर अक्टूबर 2012 से सितंबर 2022 तक के एक दशक के भारी-भरकम लीज़ बकाया थोपे जा रहे थे।

न्यायालय ने फ़ैसला सुनाया कि ऐतिहासिक समझौते प्रस्ताव के तहत किराया ढांचा-जिसे पहले उच्चतम न्यायालय ने मशहूर जमशेद होर्मुसजी वाडिया मामले में सही ठहराया था,कानूनी रूप से इन संपत्तियों पर लागू होता है और 31 मार्च 2024 तक प्रभावी रहना चाहिए।

खंडपीठ ने कहा कि एमपीए ज़मीन प्रबंधन के लिए नीतिगत दिशानिर्देशों (पीजीएलएम) के तहत ज़मीन के अनुमानित उच्चतम बाज़ार मूल्य से जुड़ी आंतरिक दर संशोधनों के ज़रिए उच्चतम न्यायालय द्वारा समर्थित इस ढांचे को एकतरफा तौर पर नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।

हालांकि यह फ़ैसला कब्ज़ाधारियों को पिछली तारीख से लागू भारी देनदारियों से बचाता है, लेकिन न्यायालय ने यह भी साफ़ किया कि एमपीए के पास एक अप्रैल 2024 से भविष्य के लिए नया किराया तय करने की कानूनी आज़ादी है-बशर्ते ऐसी गणना निष्पक्षता, तर्कसंगतता और वैधता की बुनियादी कसौटियों पर पूरी तरह खरी उतरे, न कि सार्वजनिक ज़मीन को ज़्यादा से ज़्यादा व्यावसायिक कमाई का ज़रिया माना जाए।

इस फ़ैसले से मुंबई के व्यापारी समुदाय में काफ़ी राहत महसूस की जा रही है। इससे भविष्य में लीज़ के ज़रूरी नवीनीकरण का रास्ता साफ़ हुआ है और अदालतों में लंबित मामलों के लिए कानूनी रणनीतियों को भी नई दिशा मिली है।

गौरतलब है कि जमशेद होर्मुसजी वाडिया बनाम बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज, पोर्ट ऑफ मुंबई (2004) उच्चतम न्यायालय का एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण कानूनी मामला है। यह मामला मुख्य रूप से राज्य की संस्थाओं के सार्वजनिक कर्तव्यों और एक मकान मालिक के रूप में उनके दायित्वों के बीच संतुलन बनाने से संबंधित है।

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