बैतूल , जून 15 -- मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल बैतूल जिले में उच्च शिक्षा के प्रति विद्यार्थियों का घटता रुझान चिंता का विषय बनता जा रहा है। कभी शासकीय महाविद्यालयों में प्रवेश के लिए लंबी प्रतीक्षा सूची और सीटें बढ़ाने की मांग करने वाले छात्र संगठन अब ऐसे दौर का सामना कर रहे हैं, जहां कॉलेजों में बड़ी संख्या में सीटें खाली रह गई हैं। प्रवेश प्रक्रिया के दो चरण पूरे होने के बाद भी जिले के शासकीय महाविद्यालयों में कुल सीटों का लगभग 28 प्रतिशत ही भर पाया है।
उच्च शिक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार जिले के 10 शासकीय महाविद्यालयों में स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर कुल 15 हजार 580 सीटें उपलब्ध हैं। इनमें से अब तक केवल चार हजार 332 विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया है, जबकि 11 हजार 248 सीटें खाली हैं। प्रवेश का अंतिम अवसर माने जाने वाले कॉलेज लेवल काउंसिलिंग (सीएलसी) चरण के बाद भी इन सीटों के पूरी तरह भरने की संभावना कम दिखाई दे रही है।
स्नातक स्तर पर जिले के महाविद्यालयों में 10 हजार 590 सीटें उपलब्ध हैं। दो ऑनलाइन चरणों के बाद केवल तीन हजार 218 विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया है, जिससे करीब 70 प्रतिशत सीटें खाली हैं। सबसे अधिक प्रवेश शासकीय जेएच कॉलेज बैतूल में हुए हैं, जबकि घोड़ाडोंगरी महाविद्यालय की स्थिति सबसे कमजोर है, जहां 540 सीटों में से केवल 18 विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया है।
स्नातकोत्तर स्तर पर स्थिति और अधिक चिंताजनक है। जिले के आठ महाविद्यालयों में उपलब्ध तीन हजार 840 सीटों में से केवल 973 विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया है। शाहपुर महाविद्यालय में एमए की 50 सीटों में सिर्फ एक विद्यार्थी ने प्रवेश लिया है। वहीं एक वर्षीय स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में आठनेर और भैंसदेही महाविद्यालयों में एक भी प्रवेश नहीं हुआ है। तीन महाविद्यालयों में उपलब्ध एक हजार 150 सीटों में से केवल 141 विद्यार्थियों ने दाखिला लिया है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि विद्यार्थियों का झुकाव अब पारंपरिक स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों से हटकर रोजगार आधारित व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की ओर बढ़ रहा है। इंजीनियरिंग, पैरामेडिकल, सूचना प्रौद्योगिकी, कौशल विकास तथा विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी को छात्र अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं, क्योंकि उन्हें इन क्षेत्रों में रोजगार की संभावनाएं अधिक दिखाई देती हैं।
हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार केवल व्यावसायिक पाठ्यक्रमों का आकर्षण ही इस स्थिति के लिए जिम्मेदार नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूली शिक्षा की कमजोर होती स्थिति भी इसका प्रमुख कारण है। जिले के अनेक ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में नौवीं और ग्यारहवीं कक्षा में असफल होने वाले विद्यार्थियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। एक बार पढ़ाई में पिछड़ने के बाद बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं स्कूल छोड़ रहे हैं और दोबारा शिक्षा से नहीं जुड़ पा रहे हैं।
बोर्ड परीक्षाओं में भी ग्रामीण अंचलों के विद्यार्थियों का प्रदर्शन लगातार कमजोर हो रहा है। दसवीं और बारहवीं की परीक्षाओं में असफल विद्यार्थियों की संख्या बढ़ने से शिक्षा के प्रति निराशा का माहौल बन रहा है। इसके अलावा शासकीय विद्यालयों में शिक्षकों की कमी और संसाधनों का अभाव भी शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर रहा है। दूसरी ओर आर्थिक रूप से सक्षम परिवारों का रुझान निजी विद्यालयों की ओर बढ़ने से सरकारी विद्यालयों का शैक्षणिक वातावरण भी कमजोर पड़ रहा है।
सेवानिवृत्त प्राध्यापक एम.के. मेहता का कहना है कि यह केवल बैतूल की समस्या नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में उच्च शिक्षा के सामने उभरती चुनौती है। उनका मानना है कि यदि शासन ने स्कूल स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक विद्यार्थियों को शिक्षा से जोड़े रखने के लिए प्रभावी रणनीति नहीं बनाई, तो आने वाले वर्षों में कई महाविद्यालयों का संचालन कठिन हो सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार शिक्षा से बढ़ती दूरी केवल उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए ही नहीं, बल्कि जिले के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए भी गंभीर चुनौती बन सकती है। ऐसे में स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, पर्याप्त शिक्षकों की उपलब्धता और रोजगारोन्मुखी उच्च शिक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है।
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