बैतूल , अक्टूबर 22 -- बैतूल जिले के आदिवासी अंचलों में दीपावली केवल एक दिन का त्योहार नहीं, बल्कि पूरे एक माह तक चलने वाला उत्सव है। हर गांव की अपनी दीपावली होती है, जिसमें उमड़ती है खुशियों की लहर, संगीत की थाप और परंपरा की महक। इस उत्सव की तिथि गांव के भगत (मुखिया) तय करता है, और उसी दिन गांव दीपों से जगमगा उठता है।
गुरु पूर्णिमा से दीपावली तक भगत हरी सब्ज़ी और हरी मिर्च तक का सेवन नहीं करते और अपनी पुस्तैनी परंपरा का पालन करते हैं। आदिवासी समाज में दीपावली का निमंत्रण किसी कार्ड या मोबाइल से नहीं, बल्कि स्नेह और परंपरा से भरे पीले चावल के दानों के माध्यम से दिया जाता है। घर-घर जाकर लोग रिश्तेदारों को आमंत्रित करते हैं-"हमारे गांव की दीपावली है, ज़रूर आना।"दीपावली के दिन गांव के लोग सुबह-सुबह नए मटकों में पानी भरकर लाते हैं, जो नव आरंभ और पवित्रता का प्रतीक होता है। महिलाएं मिट्टी के दीयों में घी का दीप जलाती हैं, और पूरा गांव उजाले से नहा जाता है। पशुओं के लिए भी यह दिन खास होता है-गाय, बैल और बछड़ों को नहलाया जाता है, उनके सींगों पर रंग लगाया जाता है और गले में घंटियां और मोरपंख की सजावट की जाती है।
गांव के चौपाल में लोग खिचड़ी बनाते हैं, जिसे पहले गौमाता को खिलाया जाता है, फिर सभी मिल-बांटकर ग्रहण करते हैं। यह दृश्य गांव की एकता, प्रेम और आस्था का प्रतीक है।
शाम ढलते ही डंडार नृत्य और गायकी की धुनें वातावरण में गूंज उठती हैं। युवक-युवतियाँ पारंपरिक वेशभूषा में सजे-धजे, ढोल-मांदर की थाप पर नाचते हैं। बुजुर्ग गीतों में पुरखों की स्मृति और जीवन की सीख समेटे हुए गाते हैं। यह केवल नृत्य नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति का जीवंत उत्सव है, जो दर्शाता है कि यहां की मिट्टी में संगीत, भक्ति और मेलजोल गहराई से रचा-बसा है।
आदिवासी समाज के वरिष्ठ रामदीन उइके ने बताया कि कई बार एक ही दिन दीपावली मनाने का प्रस्ताव आया, पर समाज ने इसे अस्वीकार कर दिया-"हमारी परंपरा हमारी पहचान है।" इसलिए आज भी हर गांव अपनी दीपावली अपनी तिथि पर मनाता है, अपनी खुशी और अपनी आत्मा के रंग के साथ।
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