मुंबई , अक्टूबर 04 -- राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म निर्माता सुमिरा रॉय ने कहा है कि मुंबई के बुजुर्ग लावते दंपती की 'गरिमापूर्ण मृत्यु और एक साथ जीवनलीला समाप्त करने' की मांग वाली याचिका ने ऐसी अपीलों के एक नये चलन को जन्म दिया है, जिससे यह संवेदनशील मुद्दा व्यापक सार्वजनिक चर्चा में आ गया है।
72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में अपनी वृत्तचित्र 'भंगार' के लिए सर्वश्रेष्ठ गैर-फीचर फिल्म का पुरस्कार जीतने वाली सुमिरा रॉय ने कहा कि इसी तरह के आवेदन दाखिल करने के लिए कई लोगों ने नारायण लावते से संपर्क कर उनकी याचिका की प्रतियां मांगीं।
अपनी वृत्तचित्र की विशेष स्क्रीनिंग में बोलते हुए सुमिरा रॉय ने कहा, "उनकी अपील के बाद, कई लोगों ने उन्हें पत्र लिखकर याचिका की एक प्रति भेजने का अनुरोध किया, ताकि वे उनकी इस्तेमाल की गयी कानूनी भाषा का उपयोग कर खुद याचिका दायर कर सकें। उस समय, कई लोगों के लिए अपील करना एक बढ़ता हुआ चलन बन गया था।"उन्होंने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि ऐसी याचिकाओं के पीछे के कारण व्यक्ति-दर-व्यक्ति भिन्न थे, जिसमें व्यक्तिगत परिस्थितियां और अनुभव उनके निर्णयों को आकार दे रहे थे।
यह वृत्तचित्र मुंबई के 80 वर्ष से अधिक उम्र के दंपती इरावती और नारायण कृष्णाजी लावते के जीवन का विवरण देती है, जिन्होंने पांच दशक से अधिक समय एक साथ बिताया था और गरिमा से संयुक्त रूप से अपना जीवन समाप्त करने के लिए कानूनी अनुमति मांगी थी।
संविधान के अपने व्यापक ज्ञान के लिए जाने जाने वाले नारायण लावते ने तर्क दिया कि जीने के अधिकार में स्वाभाविक रूप से मरने का अधिकार भी शामिल है। उनकी याचिका ने व्यक्तिगत स्वायत्तता, वृद्धावस्था और मरने के अधिकार के कानूनी पहलुओं के सवालों पर नये सिरे से ध्यान आकर्षित किया।
श्री रॉय ने कहा कि यह मुद्दा केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, क्योंकि उन कई देशों की विधानपालिकाओं में भी इच्छामृत्यु और गरिमा के साथ मरने के अधिकार पर बहस हुई है, जहाँ इस प्रथा की अनुमति देने वाले कानून मौजूद नहीं हैं। अपनी वृत्तचित्र के मुख्य संदेश के बारे में बोलते हुए श्री रॉय ने कहा कि समाज को बुजुर्गों को केवल शारीरिक देखभाल प्रदान करने से आगे बढ़कर उनके भावनात्मक कल्याण पर भी समान ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने कहा, "यह फिल्म संदेश देती है कि हमें बुजुर्गों के साथ बातचीत करने की जरूरत है। हम शारीरिक रूप से उनकी देखभाल कर रहे होंगे, लेकिन उन्हें भावनात्मक रूप से भी संभालने की जरूरत है। यही संदेश मुझे देश को देना है।"सुमिरा रॉय ने दंपती के रोजमर्रा के जीवन, बातचीत और रिश्ते को दर्ज करने में लगभग साढ़े चार वर्ष बिताये। उनके फैसले को आंकने के बजाय, उन्होंने उनके अनुभवों को पेश करने और दर्शकों को अपने निष्कर्ष खुद निकालने देने का विकल्प चुना।
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