जालौन , अगस्त 25 -- रक्षाबंधन का पर्व देशभर में अलग-अलग परंपराओं और रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है, लेकिन बुंदेलखंड की 'सावनी' परंपरा अपनी अनूठी सामाजिक सोच के कारण आज भी खास पहचान रखती है।
करीब 800 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में शादी के बाद पहले सावन और रक्षाबंधन के अवसर पर वर पक्ष की ओर से वधू पक्ष के घर उपहार भेजे जाते हैं। खास बात यह है कि यह परंपरा दहेज प्रथा की उस एकतरफा सोच पर चोट करती है, जिसमें हमेशा वधू पक्ष से ही देने की अपेक्षा की जाती है।
जालौन की सामाजिक कार्यकर्ता संध्या पुरवार के अनुसार बुंदेलखंड में सावनी केवल उपहार भेजने की रस्म नहीं, बल्कि दोनों परिवारों के बीच प्रेम, सम्मान और आत्मीयता बढ़ाने का माध्यम है। बदलते दौर में कई पुरानी परंपराएं धीरे-धीरे खत्म हो गईं, लेकिन गांवों और कस्बों में सावनी की परंपरा आज भी काफी हद तक जीवित है।
उषा सिंह निरंजन के अनुसार बुंदेलखंड में सावन के महीने में निभाई जाने वाली इस परंपरा का इतिहास करीब आठ शताब्दियों पुराना माना जाता है। मान्यता है कि महोबा के राजा परमाल के समय से सावनी की शुरुआत हुई। कहा जाता है कि राजा परमाल ने अपने पुत्र की ससुराल में सावन के महीने में खिलौने, कपड़े, राखियां, मिठाई और अन्य उपहार भेजे थे। तभी से बुंदेलखंड में वर पक्ष की ओर से वधू पक्ष को सावनी भेजने की परंपरा शुरू होने की बात कही जाती है।
सावन शुरू होते ही विवाहिता बेटी को उसके मायके भेज दिया जाता है। रक्षाबंधन नजदीक आने पर ससुराल पक्ष की ओर से सावनी भेजी जाती है। इसमें सोने-चांदी की राखियां, बच्चों के कपड़े, मिठाई और पारंपरिक खिलौने शामिल होते हैं। शक्कर से बनी खड़पुरी इसका खास आकर्षण होती है।
पारंपरिक खिलौनों में बांसुरी या अलगोजा, पुतरा-पुतरिया, चकरी, भौंरा और पपीरी जैसी वस्तुएं शामिल होती हैं। इसके अलावा श्रृंगार सामग्री और लकड़ी से बने सौंटा, जिन्हें रंगऊआ भी कहा जाता है, सावनी का हिस्सा रहे हैं।
सावनी में आई सामग्री को घर के आंगन में तख्त या बड़ी चारपाई पर सजाकर रखा जाता है। इसे देखने के लिए रिश्तेदारों, पड़ोसियों और गांव के लोगों को बुलाया जाता है। लोग सावनी में आए सामान को देखकर ससुराल पक्ष की स्थिति और सामर्थ्य का अंदाजा भी लगाते हैं। इसके बाद उसी अनुरूप वधू पक्ष की ओर से वर पक्ष की विदाई की तैयारी की जाती है।
बुंदेलखंड की इस परंपरा में गंभीरता के साथ हास-परिहास का भी खास स्थान है। सावनी में भेजा जाने वाला 'चिक्क बाबा' इसका दिलचस्प उदाहरण है। कई स्थानों पर इसे 'डब्बा का बब्बा' भी कहा जाता है। लकड़ी के चौकोर डिब्बे में स्प्रिंग की मदद से तैयार यह खिलौना डिब्बा खोलते ही आवाज के साथ तेजी से ऊपर आता है।
चिक्क बाबा को समधी का प्रतीक माना जाता है और इसे विशेष रूप से समधन के लिए भेजा जाता है। इसका उद्देश्य दोनों परिवारों के बीच हंसी-ठिठोली और अपनापन बढ़ाना है। जालौन मानवाधिकार संगठन की अध्यक्ष चंचल मिश्रा के अनुसार ऐसी परंपराएं रिश्तों में औपचारिकता कम करके पारिवारिक आत्मीयता बढ़ाने का काम करती हैं।
बुंदेलखंड में विवाह के बाद वधू पक्ष की ओर से वर पक्ष को नकदी, जेवर, घरेलू सामान और अन्य उपहार देने की परंपरा रही है। ऐसे में सावनी की रस्म एक अलग सामाजिक संदेश देती है। शादी के बाद पहले रक्षाबंधन पर वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष के घर उपहार भेजना यह दर्शाता है कि रिश्ता केवल लेने का नहीं, बल्कि देने और सम्मान करने का भी है।
नीलम सैनी के अनुसार सावनी में आई राखियां बहन अपने भाइयों की कलाई पर बांधती हैं और उन्हें खड़पुरी खिलाकर मुंह मीठा कराती हैं। वहीं सावनी लेकर आने वाले लोगों की जमकर खातिरदारी की जाती है। इस तरह यह रस्म दोनों परिवारों के बीच सामाजिक और पारिवारिक संबंधों को और मजबूत करती है।
बाजारवाद और बढ़ती व्यस्तता का असर सावनी की परंपरा पर भी पड़ रहा है। कई परिवार अब पारंपरिक सामान भेजने के बजाय सीधे नकदी भेजने लगे हैं। व्यस्त जीवनशैली और बाजार में आसानी से उपलब्ध उपहारों के कारण पारंपरिक खिलौनों और स्थानीय मिठाइयों का चलन भी कुछ क्षेत्रों में कम हुआ है।
हालांकि जालौन समेत बुंदेलखंड के ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में आज भी सावनी का महिलाओं और बच्चों को बेसब्री से इंतजार रहता है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि ऐसी लोक परंपराएं केवल रीति-रिवाज नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक स्मृति और पारिवारिक संबंधों की धरोहर हैं। इनका संरक्षण नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने के साथ-साथ आपसी प्रेम और सामाजिक समरसता को भी मजबूत कर सकता है।
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