नयी दिल्ली , सितंबर 03 -- उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के पास कानून की पढ़ाई कर रहे विद्यार्थियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है।

न्यायालय ने कहा कि यह अधिकार उस विश्वविद्यालय या शिक्षण संस्थान के पास होता है जहाँ विद्यार्थी दाखिला लेते हैं, और किसी व्यक्ति पर इस कानूनी संस्था का नियामक अधिकार तब शुरू होता है जब कोई कानून की पढ़ाई कर चुका व्यक्ति वकील के तौर पर पंजीकरण हो जाता है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने कहा कि अधिवक्ता अधिनियम, 1961, जिसके तहत बीसीआई का गठन किया गया था, उसे लॉ विद्यार्थियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने का कोई स्पष्ट या निहित अधिकार नहीं देता है।

यह देखते हुए कि बीसीआई ने हैदराबाद के राष्ट्रीय विधि अध्ययन एवं अनुसंधान अकादमी (नालसर) के 2026 बैच के विद्यार्थियों के खिलाफ अपना परिपत्र पहले ही वापस ले लिया था, न्यायालय ने मामले को बंद कर दिया।

न्यायालय ने बीसीआई को नालसर के विद्यार्थियों या संकाय या किसी अन्य नेशनल लॉ विश्वविद्यालय के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने से रोकने के अपने पहले के आदेश को भी सुनिश्चित कर दिया।

पीठ ने कहा कि हालांकि बीसीआई कानूनी ढांचे और लागू नियमों के तहत कानूनी शिक्षा के मानक तय कर सकती है और उन्हें लागू करवा सकती है, लेकिन विद्यार्थियों पर अनुशासनात्मक नियंत्रण उनके संबंधित विश्वविद्यालय या शिक्षण संस्थान के पास ही रहता है।

सीजेआई ने कहा कि जहां तक लॉ के विद्यार्थियों के व्यवहार का सवाल है, बीसीआई के पास न तो अधिकार क्षेत्र है और न ही कानूनी क्षमता। उन्होंने कहा कि एक वकील के तौर पर किसी व्यक्ति को विनियमित करने में इसकी भूमिका तभी शुरू होती है जब विद्यार्थी उपाधि हासिल कर लेता है और कानूनी संस्था के साथ पंजीकृत हो जाता है। उन्होंने यह भी बताया कि संबंधित नालसर के विद्यार्थियों में से किसी ने भी वकील के तौर पर पंजीकरण नहीं करवाया था।

न्यायमूर्ति बागची ने कानूनी पढ़ाई के दौरान अनुशासनात्मक नियंत्रण और वकील के तौर पर पंजीकरण के समय की जांच-पड़ताल के बीच अंतर बताया। उन्होंने कहा कि भले ही किसी विद्यार्थी का व्यवहार अनैतिक या गलत रहा हो, यह तय करना विद्यार्थी का काम है कि विद्यार्थी को कानूनी पढ़ाई जारी रखने की इजाज़त दी जाए या नहीं।

न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि बीसीआई पंजीकरण के समय यह जांच सकती है कि क्या लॉ ग्रेजुएट वकील बनने की तय शर्तों को पूरा करता है, लेकिन वह पहले से ऐसी कोई शर्त नहीं थोप सकती कि उपाधि धारण करने के बाद विद्यार्थी को पंजीकरण से वंचित कर दिया जाएगा। यह विवाद तब शुरू हुआ जब नालसर के विद्यार्थियों ने न्यायमूर्ति सूर्यकांत को उनके दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाए जाने का विरोध किया। इसके बाद बीसीआई ने एक परिपत्र जारी कर नालसर के 2026 बैच के लॉ ग्रेजुएट विद्यार्थियों के वकील के तौर पर पंजीकरण पर रोक लगा दी और विरोध प्रदर्शन के पीछे शामिल लोगों की जांच के आदेश दिये थे।

पंजीकरण पर रोक का फैसला कुछ ही घंटों में वापस ले लिया गया, हालांकि बीसीआई द्वारा शुरू की गई जांच जारी रही। बाद में बीसीआई ने वह कार्यवाही बंद कर दी और नालसर को सूचित किया कि अब और किसी कार्रवाई की ज़रूरत नहीं है।

बीसीआई ने 14 अगस्त को विवादित परिपत्र जारी किया था। इसके एक दिन बाद उच्चतम न्यायालय ने इस कदम की कड़ी आलोचना की और इसे पूरी तरह से अनावश्यक बताया। साथ ही, न्यायालय ने निर्देश दिया कि विद्यार्थियों या संकाय के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए।

सीजेआई ने कहा था कि यह मामला मूल रूप से विद्यार्थियों और उनके बीच बातचीत का विषय है और उन्होंने इस मामले में बीसीआई I के दखल पर सवाल उठाए। छात्र गतिविधियों में अपनी भागीदारी को याद करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि अगर यह मान भी लिया जाए कि छात्र गलत थे, तब भी उन्हें विरोध करने का अधिकार था और बीसीआई को इस मामले में दखल देने का कोई हक नहीं था।

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