नैनीताल , जून 19 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय से संबद्धता विवाद के बीच बीपीटी (बैचलर ऑफ फिजियोथेरेपी) प्रथम वर्ष के छात्रों को बड़ी राहत देते हुए उन्हें परीक्षा में शामिल होने की अनुमति दे दी है। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया है कि छात्रों का परीक्षा परिणाम न्यायालय की अनुमति के बिना घोषित नहीं किया जाएगा।
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता तथा न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने यह अंतरिम आदेश बीपीटी पाठ्यक्रम के 301 छात्रों की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। इस मामले में 17 जून को आदेश पारित किया गया लेकिन आदेश की प्रति आज मिल पायी।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे शैक्षणिक सत्र 2024-25 में एक संस्थान में बीपीटी पाठ्यक्रम के छात्र हैं, लेकिन विश्वविद्यालय उन्हें प्रथम वर्ष की परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दे रहा है। विश्वविद्यालय का तर्क है कि संबंधित संस्थान को राज्य विश्वविद्यालय के समय मिली अस्थायी संबद्धता अब केंद्रीय विश्वविद्यालय बनने के बाद प्रभावी नहीं रही।
सुनवाई के दौरान छात्रों की ओर से दलील दी गई कि केंद्रीय विश्वविद्यालय अधिनियम, 2009 की धारा 4(एफ) के तहत पूर्व में राज्य विश्वविद्यालय द्वारा दी गई संबद्धता जारी मानी जाएगी। इसके समर्थन में वर्ष 2014 में हाईकोर्ट द्वारा दिए गए एक पूर्व निर्णय का भी हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया था कि राज्य विश्वविद्यालय के समय दी गई संबद्धता केंद्रीय विश्वविद्यालय बनने के बाद भी जारी मानी जाएगी।
विश्वविद्यालय की ओर से यह स्वीकार किया गया कि वर्ष 2022-23 तक विभिन्न संबद्ध कॉलेजों के छात्रों को इसी कानूनी स्थिति के आधार पर परीक्षाओं में शामिल होने दिया गया था। हालांकि विश्वविद्यालय का कहना था कि संबंधित संस्थान ने केंद्रीय विश्वविद्यालय से नई संबद्धता प्राप्त नहीं की है।
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