हैदराबाद , दिसंबर 15 -- तेलंगाना किसान आयोग के चेयरमैन कोडंडा रेड्डी ने सोमवार को कहा कि बीज राष्ट्रीय स्तर और तेलंगाना की खेती का अहम हिस्सा हैं, लेकिन इन बीजों की खेती करने वाले किसानों से ज्यादा मुनाफा बीज कंपनियां कमा रही हैं।
उन्होंने एक बयान में कहा कि किसान आयोग ने केंद्रीय बीज अधिनियम-2025 के प्रारूप की बारीकी से जांच की है और उसमें कई कमियां पाई हैं। किसानों के अधिकारों की रक्षा के लिए आयोग ने गोलमेज बैठकें कीं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि किसानों को अच्छी क्वालिटी के बीज की आपूर्ति निर्बाध तरीके से हो सके।
श्री रेड्डी ने बताया कि विदेशी बीज कंपनियां 1994 से देश और राज्य में काम कर रही हैं। उन्होंने याद दिलाया कि 2004 में सरकार ने साफ कहा था कि मिलावटी बीज बेचने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। मौजूदा सरकार भी यही तरीका अपना रही है। कुछ कंपनियां हालांकि जाने-माने ब्रांड नामों के तहत नकली बीज बेच रही हैं, जिससे किसानों को भारी नुकसान हो रहा है।
उन्होंने कहा कि अकेले तेलंगाना में देश की लगभग 40 प्रतिशत बीज की खेती होती है, जो लाखों एकड़ में फैली हुई है। उन्होंने मुलुगु जिले का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां मक्के के बीज की खेती करने वाले आदिवासी किसानों को कुछ बीज कंपनियों की मनमानी के कारण भारी नुकसान हुआ। इसके बाद आयोग ने दखल दिया, एक विशेष समिति बनाई और एक विस्तृत रिपोर्ट हासिल की।
उन्होंने बताया, "मुलुगु में बीज की खेती करने वाले किसान बीमार पड़ गए और खराब बीजों के असर से मवेशी भी मर गए। कई बैठकों के बाद, हम प्रभावित आदिवासी किसानों को इंसाफ दिला पाए।" आयोग ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों से चार करोड़ रुपये तक का मुआवजा दिलवाया, जिसे उन्होंने देश के इतिहास में अपनी तरह का पहला मामला बताया।
श्री रेड्डी ने कहा कि आयोग ने सिफारिश की है कि प्रस्तावित बीज अधिनियम में मुआवजा व्यवस्था भी शामिल की जाए, क्योंकि नकली बीजों के कारण फसल खराब होने से किसानों को भारी नुकसान हो रहा है और वे लागत भी वसूल नहीं पा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि 1966 में ही दूरदर्शिता के साथ एक कानून बनाया गया था, लेकिन हाल के सालों में नकली बीजों की बिक्री तेजी से बढ़ी है। आयोग ने इन मुद्दों को हल करने के लिए सबूत पेश किए हैं और केंद्रीय बीज अधिनियम के प्रारूप में संशोधन के सुझाव दिए हैं।
उन्होंने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि खेती राज्य के अधिकार क्षेत्र में आती है, इसलिए राज्यों को भी कानून बनाने का अधिकार होना चाहिए। यह सवाल उठाते हुए कि क्या बहुराष्ट्रीय कंपनियों को कहीं और से मंजूरी लेकर राज्यों में बीज बेचने की इजाजत दी जानी चाहिए, उन्होंने तर्क दिया कि बीज की बिक्री को विनियमित करने में राज्य सरकारों के पास ज्यादा अधिकार होने चाहिए।
उन्होंने ऐसे मामलों का भी जिक्र किया, जिसमें पार्थेनियम (गाजर घास) जैसे नुकसान पहुंचाने वाले पौधे गेहूं की फसलों में उग आए और प्रोसोपिस जूलिफ्लोरा (कीकर) दूषित बीजों से फैल गया, जिससे पूरे राज्य में खेती पर असर पड़ा।
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