पटना , अप्रैल 19 -- बिहार संग्रहालय में रविवार को "संवाद: टिकुली कला - कलाकारों की नजर में" कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में प्रदेश के प्रतिष्ठित कलाकारों ने भाग लेकर इस पारंपरिक कला की समृद्ध विरासत पर विस्तार से चर्चा की। कार्यक्रम का संचालन संग्रहालय के अपर निदेशक अशोक कुमार सिन्हा ने किया।

पद्मश्री अशोक कुमार विश्वास, राज्य पुरस्कार से सम्मानित शबीना इमाम, संतोष कुमार टिकुली कलाकार रुचि कुमारी और मनीषा कुमारी ने अपने अनुभव साझा किए।

इस अवसर पर वक्ताओं ने बताया कि टिकुली कला बिहार की एक अत्यंत प्राचीन और विशिष्ट लोक कला है, जिसकी शुरुआत लगभग 800 वर्ष पहले मानी जाती है। "टिकुली" शब्द संस्कृत के "टिका" से बना है, जिसका अर्थ होता है माथे पर सजाया जाने वाला बिंदु या बिंदी। प्रारंभिक दौर में यह कला मुख्यतः कांच के टुकड़ों पर सोने की पॉलिश और नाजुक चित्रकारी के रूप में विकसित हुई थी, जिसे विशेष रूप से महिलाओं के श्रृंगार के लिए उपयोग किया जाता था।

कलाकारों ने बताया कि समय के साथ इस कला में कई बदलाव आए। महंगे कांच और सोने की जगह अब लकड़ी, हार्डबोर्ड और एनामेल रंगों का प्रयोग होने लगा है। आज टिकुली कला केवल बिंदी तक सीमित नहीं है, बल्कि ट्रे, कोस्टर, दीवार सज्जा, ज्वेलरी बॉक्स, कपड़े और अन्य सजावटी वस्तुओं पर भी इसका प्रयोग किया जा रहा है।

प्रसिद्ध कलाकार पद्मश्री अशोक विश्वास ने बताया कि वर्ष 1973 में मैट्रिक पास करने के बाद उपेंद्र महारथी संस्थान में टिकुली पेंटिंग के जरिये पेंटिंग तैयार किया करते थे। जिसके कारण उन्हें हर बार नये-नये काम मिलते रहे। वर्ष 1982 में नई दिल्ली में आयोजित एशियन गेम में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हाथों 5000 खिलाड़ियों को 4-4 यानी कुल 20,000 टिकुली पेंटिंग भेंट के तौर पर दी गयी थी।

टिकुली कलाकार रुचि कुमारी ने कहा कि टिकुली कला को कैनवास से उतार कर वस्त्र पर तैयार किया है। इसके जरिये तैयार किये गये पोशाक अपने-आप में बेहद खास है। बिहार संग्रहालय में लगे प्रदर्शनी में इस पोशाक में धोती-गमछा पर टिकुली आर्ट के जरिये खास कलाकृति तैयार की गयी है। खासकर भागलपुर की तस्ल सिल्क साड़ी पर टिकुली पेंटिंग का काम अनोखा काम किया गया है।

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