, Oct. 7 -- आईसीसीआर के उप महानिदेशक डॉ. राजेश रंजन ने नालन्दा को साझा ज्ञान और वैश्विक जुड़ाव की जीवंत परम्परा से जोड़ते हुए कहा कि ज्ञान तभी आगे बढ़ता है, जब वह राष्ट्रीय सीमाओं से परे जाकर संवाद और संबंध स्थापित करता है। उन्होंने पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने वाले एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक क्षेत्र के रूप में रेखांकित किया और बताया कि बोडो, असमिया, मणिपुरी, खासी तथा विभिन्न नागा भाषाओं सहित अनेक भाषाओं का संस्कृत, पाली, बर्मी और थाई जैसी भाषाओं से लंबे समय से संवाद रहा है।डॉ. रंजन ने साहित्य, गीतों और विद्यार्थियों की आवाजाही को देशों के बीच जीवंत सांस्कृतिक संबंधों का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। उन्होंने आईसीसीआर की छात्रवृत्ति और अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक संपर्कों का उल्लेख करते हुए कहा कि नालन्दा में अध्ययन के लिए आने वाले अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थी भारतीय संस्कृति, दर्शन और मूल्यों को समझने में विशेष रुचि रखते हैं। उन्होंने ज्ञान और सांस्कृतिक अनुभवों को साझा करने की भारत की परम्परा को वैश्विक, विशेषकर ग्लोबल साउथ के साथ जुड़ाव का महत्वपूर्ण आधार बताया।

डॉ. संतोष चौबे, कुलाधिपति, रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय ने 'वसुधैव कुटुम्बकम्' और 'विशुद्ध विश्वमित्र' की भावना को अपने संबोधन का केंद्र बनाया। उन्होंने गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की उस दृष्टि को रेखांकित किया जिसमें निर्भय मन, मुक्त ज्ञान और संकीर्ण सीमाओं से मुक्त विश्व की कल्पना है। उन्होंने कहा कि भारत की विभिन्न भाषाएँ और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ अलग-अलग होते हुए भी साझा सभ्यतागत जड़ों से जुड़ी हैं। किसी भी भाषा को पिछड़ा या श्रेष्ठ मानने के बजाय उसकी गरिमा और उसके सांस्कृतिक योगदान को समझना आवश्यक है।

मुख्य अतिथि के. श्रीनिवास, सचिव, पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय, भारत सरकार ने नालन्दा को भारत द्वारा विश्व के साथ अपने ज्ञान एवं सांस्कृतिक विरासत को साझा करने की दीर्घ परम्परा का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि आज का आयोजन पूर्वोत्तर भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया और व्यापक विश्व के बीच संबंधों को मजबूत करने के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है। उन्होंने पूर्वोत्तर भारत की भाषायी और सांस्कृतिक विविधता को रेखांकित करते हुए भाषा को केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, परम्परा, नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक स्मृति का वाहक बताया। उन्होंने पूर्वोत्तर को भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच एक महत्वपूर्ण 'हिंज' बताते हुए ऐतिहासिक व्यापार, प्रवासन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के उदाहरणों का उल्लेख किया।

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