पटना , फरवरी 12 -- बिहार विधान परिषद की कार्यवाही के दौरान गुरुवार को राज्य में बढ़ते अपराध के मुद्दे पर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी के अल्पसूचित प्रश्न के जवाब में उपमुख्यमंत्री सह गृह मंत्री सम्राट चौधरी ने राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (एनसीआरबी) और राज्य अपराध अभिलेख ब्यूरो (एससीआरबी) के आंकड़े सदन के पटल पर रखे, जिसके बाद कानून-व्यवस्था को लेकर सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली।
उपमुख्यमंत्री सह गृह मंत्री सम्राट चौधरी ने बताया कि वर्ष 2004 में राज्य में कुल 1,17,273 संज्ञेय अपराध दर्ज किये गये थे। इनमें चोरी के 11,113 और अपहरण के 3,413 मामले शामिल थे। उस समय प्रति एक लाख जनसंख्या पर संज्ञेय अपराध दर 132, चोरी की दर 12.6 और अपहरण की दर 3.9 थी।
उन्होंने कहा कि एससीआरबी के वर्ष 2024 के आंकड़ों के अनुसार राज्य में संज्ञेय अपराधों की संख्या बढ़कर 3,52,130 हो गई है। चोरी के 47,548 और अपहरण के 19,768 मामले दर्ज किये गये हैं। वर्तमान में प्रति एक लाख जनसंख्या पर संज्ञेय अपराध दर 272.5, चोरी की दर 36.8 और अपहरण की दर 15.3 बताई गई है।
गृह मंत्री श्री चौधरी ने अपहरण के मामलों में वृद्धि का कारण स्पष्ट करते हुये कहा कि अधिकांश मामले शादी की नियत से अपहरण या घर से भागने से जुड़े हैं, जिनकी संख्या 14,062 है। जबकि हत्या और फिरौती से संबंधित अपहरण के मामले महज 158 हैं। उन्होंने कहा कि पुलिस थानों तक आम लोगों की पहुंच बढ़ी है और ई- एफआईआर और जीरो- एफआईआर जैसी सुविधाओं के कारण शिकायत दर्ज करना आसान हुआ है। साथ ही, सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार 24 घंटे तक गुमशुदगी की बरामदगी नहीं होने पर मिसिंग कांड दर्ज करना अनिवार्य है। इन कारणों से दर्ज मामलों की संख्या में वृद्धि हुई है।
इस पर प्रतिक्रिया देते हुये राजद के अब्दुल बारी सिद्दीकी ने कहा कि यदि इसे ही मंगलराज कहा जा रहा है, तो इससे बेहतर तो जंगलराज था। इस टिप्पणी पर सदन में हंगामा भी हुआ। गृह मंत्री श्री चौधरी ने इसका जवाब देते हुये कहा कि बिहार पुलिस अपराध नियंत्रण के लिये पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने यह भी कहा कि वर्ष 2004-05 की तुलना में राज्य की आबादी अब बढ़कर 14 करोड़ हो गई है, जिससे आंकड़ों में स्वाभाविक वृद्धि दिख रही है।
विधान परिषद में पुलिसकर्मियों को भोजन मद में दी जाने वाली राशि का मुद्दा भी उठा। राजद के सौरभ कुमार ने कहा कि पुलिसकर्मियों को प्रतिमाह 3,000 रुपये मिलते हैं, जबकि 'दीदी की रसोई' में प्रति माह 5,700 रुपये खर्च होते हैं। इस पर गृह मंत्री ने स्पष्ट किया कि 'दीदी की रसोई' में प्रति थाली 60 रुपये में भोजन मिलता है, जबकि पुलिसकर्मियों को 3,000 रुपये प्रतिमाह उनके वेतन के अतिरिक्त दिये जाते हैं।
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