, July 22 -- श्री सिन्हा ने कहा कि प्रदेश के आम नागरिकों के सेहत का ख्याल सबसे प्रमुख विषय है और इसके लिए पारंपरिक खेती की ओर वापस लौटने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि रासायनिक खाद की जगह किसानों को पारंपरिक गोबर, गोमूत्र, गुड़ और बेसन से बने खाद के प्रयोग पर बल देने की आवश्यकता है। उन्होंने सभी सांसदों, विधायकों, ग्रामीण जनप्रतिनिधियों से कहा कि वह अपने क्षेत्र के किसानों से मिलकर कम से कम एक तिहाई ऑर्गेनिक खेती करने पर जोर दें। उन्होंने कहा कि उनका विभाग किसानों के बीच ऑर्गेनिक खेती अपनाने के लिए लगातार मुहिम चला रहा है और करीब प्रदेश के 38 जिलों में करीब 30 हजार हेक्टेयर जमीन इसके लिए चिन्हित की गई है।कृषि मंत्री ने माना कि कृषि के तरीकों में सुधार कि आवश्यकता है, जिससे आने वाली पीढ़ियों को बड़ी बीमारियों से बचाया जा सके।
इससे पहले विधायक कुमार सर्वजीत ने सदन का ध्यान कृषि में दूषित जल, अत्यधिक खाद और कीटनाशक के प्रयोग से बढ़ रही बीमारियों की ओर आकर्षित किया था। उन्होंने कहा कि शहरी इलाकों में दूषित नाले के जल से सब्जियां उगाई जा रही हैं, जिसके प्रयोग से लोग गंभीर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि सुई के प्रयोग से कद्दू के साइज बढ़ा दिए जाते हैं और सरकार के पास इस तरह के कृत्यों की निगरानी के लिए कोई उचित साधन नही है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में प्रदूषित कृषि उत्पादों के प्रयोग से बीमार होने वाले लोगों की तादाद बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि जहां दक्षिण भारत के राज्यों में प्रतिव्यक्ति चिकित्सा पर खर्च 1300 रुपया है, वही बिहार में यह खर्च दस हजार तक पहुंच गया है।
श्री सर्वजीत ने कहा कि प्रखंड स्तर पर इसकी निगरानी के लिए समिति बनाई जाएं। उन्होंने सुझाव दिया कि गांव के बेरोजगार युवकों को प्रशिक्षण देकर इस निगरानी में लगाया जाए। उन्होंने कहा कि ऐसा करने से कृषि उपज की निगरानी की जा सकेगी, किसानों को प्रशिक्षण मिलेगा तथा साथ मे बहुत से युवकों को रोजगार की की प्राप्ति होगी।
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