नयी दिल्ली , जून 15 -- उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की दोबारा नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने बिहार सरकार, पंचायती राज मंत्री श्री प्रकाश और निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी करते हुए पूछा कि क्या वह वर्तमान में राज्य सरकार में मंत्री के रूप में कार्यरत हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह ने याचिका में श्री प्रकाश की सात मई 2026 को की गयी पुनर्नियुक्ति को असंवैधानिक, अवैध और अनुच्छेद 164(4) के विपरीत घोषित करने की मांग की है।

याचिका में कहा गया है कि अनुच्छेद 164(4) के अनुसार यदि कोई मंत्री लगातार छह माह तक राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य नहीं बनता है तो उसे मंत्री पद छोड़ना पड़ता है।

याचिकाकर्ता ने यह भी मांग की है कि श्री प्रकाश से पूछा जाए कि विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य निर्वाचित हुए बिना वह किस संवैधानिक और कानूनी आधार पर पंचायती राज मंत्री के रूप में कार्य कर रहे हैं।

याचिका में कहा गया है कि राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) के नेता श्री प्रकाश को 20 नवंबर 2025 को नीतीश कुमार सरकार में मंत्री बनाया गया था, जबकि वह उस समय विधानमंडल के किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। अनुच्छेद 164(4) के तहत निर्धारित छह माह की अवधि 20 नवंबर 2025 से शुरू होकर 19 मई 2026 को समाप्त हो गयी थी। इस बीच अप्रैल 2026 में राजनीतिक घटनाक्रम के तहत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद मंत्रिपरिषद भंग हो गयी। इसके बाद 15 अप्रैल 2026 को सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस दौरान करीब 22 दिन तक श्री प्रकाश मंत्री पद पर नहीं रहे।

याचिका में कहा गया है कि इसके बावजूद सात मई 2026 को उन्हें सम्राट चौधरी मंत्रिमंडल में फिर से पंचायती राज मंत्री बना दिया गया, जबकि वह तब भी किसी सदन के सदस्य नहीं थे।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि मंत्री पद से थोड़े समय का अंतराल देकर किसी गैर-विधायक को दोबारा मंत्री बनाना संविधान की मंशा को दरकिनार करने का प्रयास है। संविधान जिस कार्य को सीधे तौर पर अनुमति नहीं देता, उसे परोक्ष रूप से करने की कोशिश नहीं की जा सकती।

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