पटना , मार्च 20 -- 'बिहार दिवस 2026' केवल एक सरकारी आयोजन नहीं, बल्कि हर बिहारी के स्वाभिमान और उसकी जड़ों की ओर लौटने का एक उत्सव है।

कला एवं संस्कृति विभाग की ओर से आयोजित यह कार्यक्रम हमारी प्राचीन विरासत और आधुनिक आकांक्षाओं के बीच एक आत्मीय सेतु बनेगा।पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में 15,000 वर्गफुट में फैला हमारा पवेलियन एक 'टाइम मशीन' की तरह होगा। यहाँ 'धरोहर दर्शन' के माध्यम से हम अपनी खोती हुई ग्रामीण विरासतों को पुनर्जीवित करेंगे। यह बुजुर्गों के लिए पुरानी यादें और बच्चों के लिए नई प्रेरणा लेकर आएगा।

बिहार की मिट्टी की महक वाली फिल्में जैसे "नदिया के पार" और "तीसरी कसम" केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि हमारे समाज का दर्पण हैं। बिहार संग्रहालय और आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय में इनकी स्क्रीनिंग के जरिए हम सिनेमा के स्वर्ण युग को फिर से जीएंगे।

22 से 26 मार्च तक प्रेमचंद रंगशाला में आयोजित 'महिला नाट्य उत्सव' हमारी आधी आबादी की रचनात्मक शक्ति और उनके संघर्षों की कहानियों को समर्पित होगा। यह मंच उनकी आवाज़ को एक नई ऊँचाई देगा।

बिहार की गूंज अब अंतरराष्ट्रीय: पहली बार बिहार का लोक संगीत और नृत्य मॉरीशस की गलियों में गूंजेगा। विभाग की एक विशेष सांस्कृतिक टोली उन 'गिरमिटिया' वंशजों के पास अपनी जड़ों का संदेश लेकर जा रही है, जिनके पूर्वज यहाँ की मिट्टी अपने साथ ले गए थे।

यह आयोजन आंकड़ों या प्रदर्शनियों का समूह नहीं है। यह हमारे पुरखों के संघर्ष और भविष्य के बिहार के सपनों का संगम है। हम अपनी कला के माध्यम से दुनिया को बता रहे हैं कि बिहार अपनी जड़ों पर खड़ा होकर आज भी फल-फूल रहा है।

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