, Sept. 23 -- अध्यक्षीय संबोधन में विभाग अध्यक्ष प्रो. विजय कुमार ने कहा कि दिनकर की अहमियत उनकी रचनाओं में देखी जा सकती है। उन्होंने राष्ट्रीय एवं सामाजिक विचारधारा से जुड़कर साहित्य का सृजन किया। उनकी रचनाएं आज के हिन्दी साहित्य को प्रभावित करने के साथ ही नई पीढ़ी को प्रेरणा भी देती हैं।विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. उमेश कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि दिनकर राष्ट्रीयता के संवाहक और सांस्कृतिक एकता के लिए प्रतिबद्ध साहित्यकार थे। उनका साहित्य आज भी प्रासंगिक है और इसी आधार पर उन्हें विश्व का क्रांति-दूत कहा जा सकता है।

मंच संचालन डॉ. बिंदु चौहान ने किया।

प्रथम सत्र में डॉ. दीपक त्रिपाठी, प्रो. भगवान सिंह, डॉ. शंकर कुमार एवं डॉ. सुभद्रा कुमारी सिन्हा ने विचार व्यक्त किए। डॉ. त्रिपाठी ने दिनकर के शाश्वत साहित्य और उनके काव्य में पौराणिकता के तत्वों पर चर्चा की। प्रो. भगवान सिंह ने दिनकर की कविताओं को भारतीयता एवं भारतीय संस्कृति से जोड़ते हुए उन्हें संस्कृति की श्रेष्ठ अभिव्यक्ति बताया। डॉ. शंकर कुमार ने दिनकर की युग चेतना एवं सहजता पर प्रकाश डाला, जबकि डॉ. सुभद्रा कुमारी सिन्हा ने उनके काव्य में जातिगत विडंबनाओं को रेखांकित किया।

डॉ. बिंदु चौहान ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि जीवन और जगत का सत्य दिनकर की कविताओं में आज भी देखा जा सकता है। डॉ. अनिरुद्ध सिंह ने कहा कि दिनकर आज भी प्रासंगिक और अनुकरणीय हैं।

अंतिम सत्र की अध्यक्षता प्रो. विजय कुमार ने की। इसमें डॉ. वीरेंद्र कुमार दत्ता, डॉ. ज्वाला चंद्र चौधरी एवं डॉ. संजीव कुमार ने विचार व्यक्त किए। मंच संचालन शोधार्थी रोहित कुमार पटेल तथा धन्यवाद ज्ञापन शोधार्थी बेबी कुमारी ने किया।

संगोष्ठी में शोधार्थी कंचन रजक, संध्या राय, मलय नीरव, जय प्रकाश कुमार, सुफिया खातून, रोहित कुमार पटेल, अपर्णा, शिवानी, नेहा, नबी हुसैन, ज्योति सिन्हा, अंशु कुमारी, अमित कुमार, रूबी कुमारी, निशा, खुशबू एवं धीरज सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित थे।

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