, Oct. 17 -- ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारियों के अनुसार, पूर्व में थर्मोकोल अपशिष्ट का कोई खरीदार न होने और बेहद हल्का एवं ज्यादा जगह घेरने के कारण इसके भंडारण एवं निस्तारण में काफी समस्या आती थी। इस चुनौती से निपटने के लिए स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) की प्रखंड क्रियान्वयन समिति ने स्थानीय स्तर पर निजी कबाड़ व्यवसायी ब्रदर प्लास्टिक्स को इसके संग्रहण और पुनर्चक्रण के लिए प्रेरित किया।वर्ष 2017 से ब्रदर प्लास्टिक्स के संचालक दीपक कुमार ने कचरा केंद्रों से थर्मोकोल खरीदकर लम्प्स बनाना शुरू किया। धीरे-धीरे तकनीक में सुधार करते हुए वर्ष 2023 से आधुनिक मशीनों की मदद से लम्प्स से सीधे थर्मोकोल का दाना (ग्रैन्यूल्स) तैयार करना शुरू किया गया। आज यह उद्योग पटना के 8, रांची के 2 और बनारस के 1 कबाड़ी से थर्मोकोल अपशिष्ट खरीद रहा है। ब्रदर प्लास्टिक्स के संचालक दीपक का कहना है कि केंद्र पर अपशिष्ट को छोटे टुकड़ों में तोड़कर पिघलाया जाता है, जिससे ठोस लम्प्स बनते हैं, फिर ग्राइंडिंग मशीन से पाउडर बनाकर उसमें आवश्यकतानुसार रसायन मिलाए जाते हैं और एक्सट्रूडर मशीन के जरिए मोटे रेशे बनाकर छोटे-छोटे दानों में काट लिया जाता है। इन दानों का उपयोग दोबारा नई थर्मोकोल शीट आदि बनाने में होता है।
वर्तमान में खुशरूपुर के अलावलपुर स्थित इस इकाई में प्रतिमाह करीब 40 से 50 टन थर्मोकोल दाने का उत्पादन हो रहा है। औसतन 35,000 रुपये प्रति टन की दर से इसका मासिक बाजार मूल्य लगभग 17.50 लाख रुपये बैठता है। अपशिष्ट थर्मोकोल से नया थर्मोकोल शीट बनाने तक के इस पूरे कार्य में स्थानीय स्तर पर 12 लोगों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार भी मुहैया कराया गया है।
विभागीय अधिकारियों के अनुसार, अलावलपुर का यह मॉडल साबित करता है कि सही रणनीति और सुदृढ़ बाजार व्यवस्था से कचरे से संपदा (वेस्ट टू वेल्थ) की अवधारणा को धरातल पर साकार किया जा सकता है।
मंत्री श्री कुमार ने कहा कि लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण कार्य किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीतामढ़ी में सिंगल यूज़ प्लास्टिक से निर्मित बेंच की सराहना की। इसी प्रकार, प्लास्टिक अपशिष्ट से पेवर ब्लॉक, सजावटी सामग्री, गमले, खिलौने और इंटरलॉकिंग टाइल्स बनाने के साथ-साथ सड़क निर्माण में भी इसका उपयोग किया जा रहा है। राज्य में थर्मोकोल अपशिष्ट से दाने तैयार कर उसके पुनर्चक्रण को बढ़ावा दिया जा रहा है। विभाग के समन्वित प्रयासों और उद्यमों के सहयोग से बिहार अपशिष्ट को संसाधन और संपदा में बदलने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ये नवाचार वेस्ट टू वेल्थ और सर्कुलर इकोनॉमी की अवधारणा को साकार करने के साथ-साथ प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन के क्षेत्र में बिहार की अग्रणी भूमिका को मजबूत कर रहे हैं।
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