पटना , जुलाई 23 -- िहार के करीब 8387 पंचायतों में रहने वाली लाखों विधवाओं और उनके आश्रित बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लूम्बा फॉउंडेशन बिहार सरकार के साथ प्रदेश के पंचायत स्तर पर कार्य करना चाहता है। प्रदेश के पंचायती मंत्री दीपक प्रकाश को प्रेषित एक ईमेल में लूंबा फॉउण्डेश ने कहा है कि देशव्यापी पंचायती स्तर पर विधवाओं और उनके आश्रित बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए फाउंडेशन बड़े पैमाने पर बिहार से अपनी योजना की शुरुआत करना चाहता है। साथ ही, यह भी अपेक्षा रखता है कि प्रदेश की सरकार मदद करेगी।

पिछले वर्ष बिहार के दस जिलों दरभंगा, मधुबनी, पटना, छपरा, भागलपुर, समस्तीपुर, सिवान, चम्पारण, गया और बेगूसराय में विधवाओं और उनके बच्चों/आश्रितों को अपने-अपने पैरों पर खड़े होने के लिए सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के साथ उन्हें आत्म निर्भर बनाने के लिए लूम्बा फॉउंडेशन अनेक प्रकार की तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान किया था ।

ईमेल में कहा गया है कि "लूम्बा फॉउंडेशन चाहता है कि बिहार के विधवाओं के सम्मानार्थ, उनके बच्चों/आश्रितों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रदेश के सभी 8387 पंचायतों तक पहुंचना चाहता है, जिससे उन्हें विभिन्न प्रकार की शिक्षा और तकनीकी शिक्षा के माध्यम से आर्थिक, सामाजिक रूप से मजबूत बनाया जा सके।"अब तक, लूंबा फाउंडेशन ने 17 राज्यों में काम किया है और 25,000 विधवाओं को सशक्त बनाया है। लूंबा फाउंडेशन ने बिहार में 2,000 विधवाओं और उनके बच्चों को सशक्त बनाने के लिए 'सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइज़ेशन' के साथ साझेदारी की है।

लूम्बा फॉउंडेशन गया, पटना, समस्तीपुर, चंपारण, छपरा, मधुबनी, सिवान, बेगूसराय, भागलपुर और दरभंगा में नवंबर 2024 से मार्च 2025 के दौरान 600 विधवाओं और जून 2025 से सितंबर 2025 के दौरान 1,400 विधवाओं तक अपनी पहुँच बनाई। इन 1,400 लोगों में से 1,131 लोगों को अलग-अलग तरह के रोज़गार मिल गए। काम पाने वालों में बड़ी संख्या महिलाओं की थी, जिनमें खास तौर पर 374 विधवाएँ और विधवाओं के 757 बच्चे शामिल थे।

1997 में, लॉर्ड राज लूंबा और उनकी पत्नी लेडी लूंबा ने यूनाइटेड किंगडम में अपनी दिवंगत माँ के नाम पर एक चैरिटी शुरू की। उनकी माँ 23 जून 1954 को पंजाब (भारत) में 37 साल की कम उम्र में विधवा हो गई थीं। हालाँकि उन्होंने खुद कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी, फिर भी उन्होंने अपने सभी 7 बच्चों (जिनमें लड़कियाँ भी शामिल थीं) को शिक्षित किया। पति के निधन के बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल गया और उन्हें विधवा होने के कारण भेदभाव का सामना करना पड़ा, जिसे उन्होंने चुपचाप सहा।

इस फाउंडेशन का शुरुआती मकसद भारत में गरीब विधवाओं के बच्चों को शिक्षित करना था (भारत में भी इसकी एक सहयोगी चैरिटी रजिस्टर्ड है)। हालांकि, 2012 से फाउंडेशन एक सस्टेनेबल डेवलपमेंट प्रोग्राम (सतत विकास कार्यक्रम) के ज़रिए न केवल भारत में, बल्कि बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, ग्वाटेमाला, चिली, केन्या, तंजानिया, युगांडा, मलावी और दक्षिण अफ्रीका में भी जरूरतमंद विधवाओं को सशक्त बना रहा है। इससे वे आत्मनिर्भर बन सकें, अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा सकें, अपने आश्रितों की मदद कर सकें और सम्मानजनक जीवन जी सकें।

यह कामयाबी समाज में हाशिए पर रहने वाली महिलाओं की मदद करने के लिए लुम्बा फ़ाउंडेशन और सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइज़ेशन के मज़बूत संकल्प को दिखाती है। खास स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम के ज़रिए, उन्होंने उन महिलाओं की मदद की है जिन्हें काम खोजने में बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता था। इन समूहों पर ध्यान देकर, लुम्बा फ़ाउंडेशन ने न सिर्फ़ उन्हें ज़रूरी हुनर सिखाए हैं, बल्कि उनके लिए रोज़ी-रोटी कमाने और ज़्यादा आत्मनिर्भर बनने के असली मौके भी पैदा किए हैं।

लुम्बा फ़ाउंडेशन और सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइज़ेशन की कोशिशों ने आर्थिक रूप से शामिल करने और इन महिलाओं को अपने और अपने परिवारों के लिए बेहतर भविष्य बनाने में मदद करने में अहम भूमिका निभाई है। खास ट्रेनिंग और मदद देकर, लुम्बा फ़ाउंडेशन और सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइज़ेशन ने महिलाओं को अपनी ज़िंदगी की बागडोर संभालने और अपने समुदायों में सार्थक तरीके से योगदान देने के लिए सशक्त बनाया है।

05 अक्टूबर 2025 को सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइज़ेशन ने लूंबा फ़ाउंडेशन के साथ मिलकर 'प्रॉस्पेरिटी फ़ॉर विडोज़' (विधवाओं के लिए समृद्धि) कार्यक्रम आयोजित किया। यह एक अहम पहल थी जिसमें बिहार की 2,000 विधवाओं और युवाओं की ज़िंदगी में आए बदलाव था । यह बदलाव स्किल ट्रेनिंग और रोज़गार के मौकों के ज़रिए आया, जिससे वे आत्मनिर्भर जीवन जीने में सक्षम हो सकीं।

लूंबा फ़ाउंडेशन के फ़ाउंडर लॉर्ड राज लूंबा ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कैसे सशक्तिकरण का असर सिर्फ़ व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवारों और पूरे समुदायों तक पहुँचता है। उन्होंने कहा, "दो हज़ार लोगों की ज़िंदगी बदलने का मतलब है दो हज़ार परिवारों को उम्मीद देना।" उन्होंने कहा कि विधवाओं की समृद्धि का मतलब है पूरे समाज की समृद्धि है।

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