औरंगाबाद , मार्च 04 -- िहार की सांस्कृतिक परंपराएँ विविधता तथा रंगों से सजी हुई हैं और यहां का लोकजीवन उत्सवों की लय में प्रवाहित होता है और पर्वों का उत्साह उनके समाप्त होने के बाद भी बना रहता है,इसी उल्लास की अनूठी मिसाल है 'झुमटा' परंपरा जो होली के ठीक अगले दिन, रंगों की जीवंतता को नई ऊर्जा के साथ जीवंत कर देती है। यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना, सौहार्द और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का उत्सव है। झुमटा की परंपरा खासकर बिहार के मगध क्षेत्र में आज भी विद्यमान है ।

'झुमटा' यह शब्द अपने भीतर झूमने, झूमकर गाने और आनंद के पूर्ण विस्तार को समेटे हुए है। होली के रंगों में सराबोर बिहार की यह परंपरा समाज को एकता के सूत्र में बाँधने का कार्य करती है। इस दिन गाँव-गाँव, कस्बों और शहरों में लोग झुंड बनाकर निकलते हैं। पुराने समय में ये टोली बैलगाड़ियों पर सवार होकर निकलती थी, लेकिन आज ट्रक और ट्रैक्टरों ने उनकी जगह ले ली है।

बड़े-बड़े बर्तनों में रंग भरे जाते हैं, जिन्हें पूरे जोश और उमंग के साथ लोगों पर उड़ेला जाता है। इन वाहनों के पीछे झूमते-गाते लोगों की भीड़ चलती है, और राह में आने वाला शायद ही कोई व्यक्ति रंगे बिना बच पाता हो। होली की उन्मुक्तता जहाँ रंगों के साथ कीचड़, मिट्टी और अन्य पारंपरिक तत्वों को भी समेटे होती है, वहीं झुमटा अपेक्षाकृत संयमित और सौंदर्यपरक होता है। यहाँ केवल रंगों की बरसात होती है, जिसमें प्रेम और भाईचारे का गहरा रंग घुला होता है।

झुमटा का सबसे आकर्षक पहलू इसकी गायकी है। लोकगायकों की टोली इस जुलूस का अभिन्न अंग होती है। परंपरागत लोकधुनों और होली गीतों के साथ यह यात्रा आगे बढ़ती है। समय के साथ इस परंपरा में भी परिवर्तन आए हैं। टेलीविजन और इंटरनेट के प्रसार ने झुमटा में ब्रज की होली के तत्व भी जोड़ दिए हैं। अब इसमें मटका-फोड़ प्रतियोगिता भी शामिल हो गई है, जो पहले नहीं हुआ करती थी। यह बदलाव यह दर्शाता है कि लोकसंस्कृति अपनी जड़ों से जुड़ी रहकर भी समय के साथ समायोजन करना जानती है।

झुमटा केवल रंगों और संगीत का उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप का एक अवसर भी है। यह विभिन्न वर्गों, जातियों और पृष्ठभूमियों से आने वाले लोगों को एक सूत्र में बाँधता है। इसका रंग-गुलाल केवल कपड़ों पर नहीं, बल्कि आत्माओं पर चढ़ता है। बिहार की इस अलौकिक परंपरा में उत्सवधर्मिता का सच्चा प्रतिबिंब झलकता है।

झुमटा की यह जीवंत परंपरा हमें यह याद दिलाती है कि त्योहार केवल एक दिन के लिए नहीं होते, वे समाज को जोड़ने और एक-दूसरे के प्रति प्रेम और सम्मान प्रकट करने का माध्यम होते हैं। होली के बाद की यह सांस्कृतिक बयार न केवल परंपरा की खुशबू बिखेरती है, बल्कि बिहार की लोकसंस्कृति की समृद्धि को भी दर्शाती है।

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