, July 15 -- अध्यक्षीय संबोधन में स्नातकोत्तर इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार चौधरी ने कहा कि इतिहास और साहित्य का संबंध अन्योन्याश्रित है। उन्होंने कहा कि इतिहास सत्य, तथ्य और प्रमाणिक स्रोतों पर आधारित होता है, जबकि साहित्य कल्पनाशीलता के माध्यम से समाज और जीवन को अधिक सरस एवं संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करता है। उन्होंने कहा कि इतिहास-लेखन में साहित्यिक स्रोत उपयोगी होते हैं, लेकिन पुरातात्विक साक्ष्य अपेक्षाकृत अधिक प्रमाणिक माने जाते हैं।विषय-प्रवर्तन करते हुए संस्कृत विभाग के प्राध्यापक डॉ. आर.एन. चौरसिया ने कहा कि साहित्य और इतिहास एक-दूसरे के पूरक हैं। साहित्य समाज का दर्पण है, जबकि इतिहास समाज के विकास और परिवर्तन की दिशा को रेखांकित करता है। उन्होंने कहा कि साहित्य के अध्ययन के बिना किसी भी युग के सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास की समग्र व्याख्या संभव नहीं है। इतिहास यह बताता है कि क्या हुआ, जबकि साहित्य यह संकेत देता है कि क्या होना चाहिए।

समाजशास्त्र विभाग की प्राध्यापिका डॉ. लक्ष्मी कुमारी के संचालन में आयोजित कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए संयोजक डॉ. मनीष कुमार ने कहा कि इतिहासकार साक्ष्यों, शिलालेखों और दस्तावेजों के आधार पर निष्पक्ष होकर घटनाओं का विश्लेषण करता है, जबकि साहित्यकार की प्रतिबद्धता भावात्मक सत्य से होती है। उन्होंने इतिहास और साहित्य को एक ही गाड़ी के दो पहिए बताते हुए कहा कि दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।

कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत पाग एवं चादर भेंटकर किया गया। इस अवसर पर हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. उमेश कुमार, राजनीति विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार चौधरी, गोयनका कॉलेज, सीतामढ़ी की इतिहास प्राध्यापिका डॉ. बबीता कुमारी, जेएनयू, नई दिल्ली के पूर्व छात्र संजय कुमार, डॉ. सुशील कुमार सुमन, शोधार्थी राजनाथ पंडित, शिवम कुमार झा, कंचन, वीणा सहित बड़ी संख्या में शिक्षक, शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित थे।

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