, Oct. 24 -- प्रतिभागियों को इन विषयों पर व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया गया जिससे वे चिकित्सा अनुसंधान में इन पद्धतियों का बेहतर उपयोग कर सकें।कार्यशाला में एम्स देवघर के डॉ. शेषाद्रि रेड्डी वरिकासुवु, एम्स नई दिल्ली की क्लिनिकल रिसर्च यूनिट के वैज्ञानिक डॉ. प्रदीप कुमार तथा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के डॉ. विकास धिकाव ने विशेषज्ञ के रूप में योगदान दिया। उन्होंने वैज्ञानिक शोध की गुणवत्ता परखने और उसके निष्कर्षों को चिकित्सा के क्षेत्र में उपयोग करने के विभिन्न पहलुओं पर प्रतिभागियों का मार्गदर्शन किया।
कार्यशाला का एक प्रमुख विषय ग्रेड पद्धति भी रहा। इस पद्धति की मदद से यह आकलन किया जाता है कि किसी बीमारी के इलाज या चिकित्सा संबंधी निर्णय के लिए उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाण कितने विश्वसनीय हैं।
विशेषज्ञों ने बताया कि व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण के माध्यम से किसी विषय पर उपलब्ध विभिन्न शोधों के निष्कर्षों को एक साथ समझा जा सकता है। इससे उपचार संबंधी दिशा-निर्देश तैयार करने और मरीजों के इलाज से जुड़े फैसलों को वैज्ञानिक आधार देने में मदद मिलती है।
कार्यशाला में इस बात पर भी जोर दिया गया कि चिकित्सा के क्षेत्र में केवल अनुभव ही नहीं बल्कि विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण भी महत्वपूर्ण हैं। शोध के निष्कर्षों का सही आकलन डॉक्टरों को उपचार के बेहतर विकल्प चुनने और मरीजों को अधिक प्रभावी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने में मदद कर सकता है।
इस पहल से बिहार के चिकित्सा संस्थानों में अनुसंधान क्षमता को मजबूत करने, डॉक्टरों के बीच वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने और चिकित्सा अनुसंधान के क्षेत्र में आपसी सहयोग बढ़ाने में मदद मिलेगी।
एम्स पटना की यह पहल चिकित्सा शिक्षा, अनुसंधान और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
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