, March 10 -- डॉ. भावेश चंद्र साहा ने बताया कि ग्लूकोमा होने का अधिक जोखिम उन लोगों में होता है जो 40 वर्ष से अधिक आयु के हैं, मधुमेह से पीड़ित हैं, जिनमें उच्च मायोपिया (ज्यादा नंबर का चश्मा) है, जिनके परिवार में ग्लूकोमा का इतिहास है, जिनकी आंखों में पहले चोट लगी हो, तथा जो लोग बिना चिकित्सकीय सलाह के या लंबे समय तक स्टेरॉयड का उपयोग करते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि इन उच्च जोखिम वाले लोगों को बीमारी की समय पर पहचान और उचित उपचार के लिए नियमित रूप से आंखों की जांच करवानी चाहिये।

श्री साहा ने बताया कि नवजात शिशुओं में कुछ लक्षण जैसे आंखों का असामान्य रूप से बड़ा होना, आंखों से अधिक पानी आना, आंखों का सफेद और बड़ा दिखाई देना तथा तेज रोशनी से संवेदनशीलता (फोटोफोबिया) जन्मजात ग्लूकोमा के संकेत हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे शिशुओं की समय पर ग्लूकोमा स्क्रीनिंग और विस्तृत नेत्र परीक्षण कराना आवश्यक है, जिससे बीमारी की जल्दी पहचान हो सके और उचित उपचार दिया जा सके।

कार्यक्रम को अन्य विशिष्ट अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति और उनके विचारों ने भी समृद्ध किया। इनमें डॉ प्रो. (डॉ.) उमेश भदानी (विभागाध्यक्ष, एनेस्थीसिया), प्रो. (डॉ.) बिनय कुमार, फोरेंसिक चिकित्सा विभाग, (डॉ.) पंकज कुमार (विभागाध्यक्ष, न्यूक्लियर मेडिसिन) तथा (डॉ.) आनंद कुमार राय (विभागाध्यक्ष, न्यूरोलॉजी) शामिल थे। सभी ने सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रमों के महत्व पर बल देते हुए नेत्र स्वास्थ्य को बढ़ावा देने, ग्लूकोमा के प्रति जागरूकता फैलाने तथा रोके जा सकने वाले अंधत्व की रोकथाम की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम में डॉ. सोनी सिन्हा, डॉ. देव कांत सहित नेत्र रोग विभाग के रेजिडेंट डॉक्टर, ऑप्टोमेट्रिस्ट, नर्सिंग अधिकारी और अन्य स्टाफ सदस्य भी उपस्थित रहे तथा उन्होंने कार्यक्रम में सक्रिय भागीदारी निभाई।

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