, March 7 -- डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद सुमन ने कहा कि अज्ञेय ने प्रगतिवादी विचारधारा के बरक्स व्यक्तिवाद को स्थापित करने के लिए 'वाद' को खारिज कर नये शिल्प के नाम पर प्रयोगवाद और फिर नई कविता का प्रवर्तन किया था। अज्ञेय की काव्य-चेतना का मूल स्वर आत्मनिष्ठ व्यक्तिवाद है। उच्च मध्यवर्गीय जीवन उनके काव्य का विषय रहा है। इसलिए उनकी काव्य-संरचना के शिल्प में 'मैं' शैली की प्रधानता है। तार सप्तक से लेकर पांचवें सप्तक तक के अभियान में अज्ञेय ने अस्तित्ववादी व्यक्तिवाद को स्थापित करने का पुरजोर प्रयास किया था। यह बात दीगर है कि उनके इस सप्तकीय अभियान में मुक्तिबोध और शमशेर जैसे धुर मार्क्सवादी कवि भी व्यक्तिवाद पर केन्द्रित पूंजीवाद को तुर्की बा तुर्की जवाब देने के लिए जुट गए।
सह प्राचार्य डॉ. महेश प्रसाद सिन्हा ने कहा कि अज्ञेय मूलतः कवि हैं। यूं उन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक और पत्रकारिता का भी सृजन किया है। उनके विराट व्यक्तित्व के दो पक्ष दिखलाई पड़ते हैं। आरम्भिक पक्ष जो व्यक्ति की संवेदनाओं से जुड़ा हुआ है। व्यक्ति के व्यक्तित्व, अस्तित्व और अस्मिता की लगातार खोज उन्होंने की। व्यक्ति स्वातंत्र्य का प्रबल पक्ष उनकी सभी रचनाओं में दिखलाई पड़ता है। उनका उत्तर पक्ष, सामाजिक संवेदनाओं का है, जिसमें वे समाज से लागतार जुड़ने का प्रयास करते हैं। कुल मिलाकर उनके व्यक्तित्व में व्यक्ति और समाज का सामंजस्य देखने को मिलता है।
विभागीय सहायक प्राध्यापिका डॉ. मंजरी खरे ने कहा कि अज्ञेय राहों के अन्वेषी रहे हैं। वर्तमान समय में भी नए परिदृश्य एवं नवीन परिस्थितियों के अनुसार नई राहों की तलाश की एक बार पुनः आवश्यकता है। उनका साहित्य प्रयोगों का एक व्यापक स्वरूप दर्शाता है। उन प्रयोगों को देखते हुए साहित्य में भी नवीन प्रयोगधर्मी विचारधाराओं की संभावना अभी भी बनी हुई है।अज्ञेय की भाषा को आधुनिक हिंदी कविता का प्रतीक माना जाता है, जिसमें उन्होंने अभिव्यक्ति की नवीनता, रूपक और प्रतीकात्मकता का भरपूर उपयोग किया। उनकी रचनाएँ साहित्यिक गहराई और सामाजिक यथार्थ को जोड़ने वाली कड़ी हैं।
कार्यक्रम का संचालन तथा धन्यवादज्ञापन शोधार्थी समीर ने किया। इस अवसर पर शोधार्थी अपर्णा कुमारी, नबी हुसैन, रूपक कुमार आदि ने भी अपनी बातें रखी। बड़ी संख्या में स्नातकोत्तर की छात्र-छात्राएं उपस्थित थे।
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