चंडीगढ़ , जून 13 -- ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (एआईपीईएफ) ने शनिवार को बिजली संशोधन विधेयक-2025 का कड़ा विरोध करते हुए केंद्र सरकार से इसे तत्काल वापस लेने की मांग की है। फेडरेशन ने बिजली क्षेत्र के निजीकरण, बंटवारे और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को कमजोर करने वाले सभी प्रावधानों को जनविरोधी बताते हुए इनके खिलाफ देशव्यापी संघर्ष का ऐलान किया है।
बैठक की जानकारी देते हुए मीडिया सलाहकार वी.के. गुप्ता ने बताया कि परिषद ने कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किये। एआईपीईएफ की फेडरल काउंसिल की बैठक की अध्यक्षता शैलेंद्र दुबे ने की, जिसमें पंजाब सहित 21 राज्यों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
श्री दुबे ने कहा कि बिजली (संशोधन) बिल-2025 कोई सुधारात्मक कदम नहीं, बल्कि बिजली क्षेत्र के निजीकरण का माध्यम है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस बिल का उद्देश्य बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन और वितरण को धीरे-धीरे कॉर्पोरेट और निजी कंपनियों के हवाले करना है। उन्होंने कहा कि बिजली क्षेत्र में किसी भी सुधार का उद्देश्य सस्ती और भरोसेमंद बिजली, सभी उपभोक्ताओं तक आसान पहुंच तथा जनता के प्रति जवाबदेही होना चाहिए, न कि निजी कंपनियों के मुनाफे को बढ़ाना।
बैठक में एक ही क्षेत्र में सार्वजनिक धन से विकसित वितरण नेटवर्क का उपयोग करते हुए कई वितरण लाइसेंसधारियों (मल्टीपल डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंस) को अनुमति देने के प्रस्ताव का भी विरोध किया गया। एआईपीईएफ का कहना है कि इससे निजी कंपनियां केवल लाभदायक औद्योगिक और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं को चुनेंगी, जबकि घरेलू, कृषि और ग्रामीण उपभोक्ताओं का भार सरकारी वितरण कंपनियों पर ही रहेगा।
फेडरल काउंसिल ने अपने प्रस्ताव में कर्नाटक, हरियाणा, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में समानांतर वितरण लाइसेंस देने की नीति को 'पिछले दरवाजे से निजीकरण' करार दिया। परिषद ने कहा कि इससे सार्वजनिक वितरण व्यवस्था, ग्रामीण विद्युतीकरण और सरकारी डिस्कॉम की वित्तीय स्थिति पर गंभीर असर पड़ेगा।
बैठक में महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और हरियाणा सहित विभिन्न राज्यों में अलग कृषि वितरण कंपनियां (एग्रीकल्चर डिस्कॉम) बनाने के प्रयासों का भी विरोध किया गया। एआईपीईएफ का मत है कि यह मॉडल तकनीकी, व्यावसायिक और वित्तीय दृष्टि से व्यावहारिक नहीं है।
फेडरेशन ने आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा विशाखापट्टनम में प्रस्तावित गूगल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डेटा सेंटर को अलग वितरण लाइसेंस या विशेष दर्जा देने के निर्णय पर भी आपत्ति जताई। परिषद ने कहा कि इस प्रकार के कदम भविष्य में सार्वजनिक क्षेत्र की वितरण कंपनियों की वित्तीय व्यवहार्यता को प्रभावित कर सकते हैं और निजीकरण को बढ़ावा दे सकते हैं।
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