जयंत राय चौधरी से.....कोलकाता , मई 29 -- पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर राय ने कहा है कि तृणमूल कांग्रेस (तृणमूल) बिखरने की ओर बढ़ रही है। उन्होंने इसकी वजह पार्टी की अपनी हार के कारणों पर आत्ममंथन करने में असमर्थता को बताया।

श्री राय ने यूनीवार्ता को दिये साक्षात्कार में कहा, "यह पार्टी अपने मौजूदा स्वरूप में आगे नहीं चल पाएगी। मेरा मानना है कि यह बिखर जाएगी।" उन्होंने संकेत दिया कि उन्होंने अभी तक अपने राजनीतिक भविष्य के बारे में कोई फैसला नहीं किया है। उन्होंने कहा, "मैंने अभी यह तय नहीं किया है कि मुझे कहाँ जाना है या राजनीति से संन्यास लेना है।"श्री राय तृणमूल के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक और बंगाल के कई पीढ़ियों के राजनेताओं (जिनमें दिवंगत राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी शामिल हैं) के करीबी सहयोगी रहे है। उन्होंने कहा कि पार्टी में वैचारिक शून्यता, भ्रष्टाचार का व्यापक बोलबाला और चुनावी असफलताओं के कारणों पर आत्ममंथन करने में असमर्थता ने इसे बिखरने की कगार पर ला खड़ा किया है। उन्होंने कहा, "विचारधारा से विहीन और अपनी स्थापना के बाद से सबसे बुरी हार का सामना कर रही यह पार्टी इस संकट से उबर नहीं पाएगी।"श्री राय के अनुसार, इसका संभावित नतीजा यह होगा कि पार्टी के अलग-अलग समूह विरोधी राजनीतिक दलों की ओर चले जाएंगे। उन्होंने कहा, "मेरा मानना है कि इसके कई विधायक और सांसद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हो जाएंगे, जबकि कुछ कांग्रेस में चले जाएंगे। एक तीसरा समूह मार्क्सवादी कम्युनिस्ट (माकपा) की ओर जाएगा, जबकि चौथा और छोटा समूह राजनीति से संन्यास लेने का फैसला करेगा।"उन्होंने कहा कि उन्होंने अभी यह तय नहीं किया है कि वे सक्रिय राजनीति में बने रहेंगे या नहीं। उन्होंने कहा, "अगले साल राजनीति में मेरे 60 साल पूरे हो जाएंगे और मुझे लगता है कि यह एक बहुत लंबी यात्रा रही है। मैंने अभी यह तय नहीं किया है कि मुझे क्या करना है। हो सकता है मैं संन्यास ले लूं, या हो सकता है मैं राजनीति में बना रहूं, लेकिन अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है।"श्री राय ने मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम को एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में तर्क दिया कि बंगाल में पारंपरिक रूप से कोई भी क्षेत्रीय राजनीतिक दल लंबे समय तक टिक नहीं पाया है। उन्होंने कहा, "अगर आप इतिहास देखें, तो बंगाल में कभी भी कोई सफल क्षेत्रीय पार्टी नहीं रही है।" इस संदर्भ में उन्होंने 1966 में कांग्रेस से अलग होने के बाद श्री अजय मुखर्जी द्वारा गठित 'बांग्ला कांग्रेस' का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा, "बांग्ला कांग्रेस एक प्रयोग था, लेकिन यह सफल नहीं हुआ। आखिरकार, बांग्ला कांग्रेस को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय करना पड़ा।"उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को अपना 'राजनीतिक गुरु' बताते हुए कहा कि श्री मुखर्जी ने अपना राजनीतिक करियर बांग्ला कांग्रेस से शुरू किया था और बाद में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दाहिने हाथ बन गए थे। उनका लंबे समय से यह मानना था कि तृणमूल आखिरकार कांग्रेस के खेमे में वापस आ जाएगी। उन्होंने कहा,, "श्री मुखर्जी हमेशा यह मानते थे कि किसी न किसी मोड़ पर तृणमूल कांग्रेस में वापस आ जाएगी।" उन्होंने कहा, "हालांकि, ठीक वैसा तो नहीं होगा, लेकिन तृणमूल बिखरने वाली है, और इसके कुछ हिस्से अलग-अलग पार्टियों की ओर चले जाएंगे।

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