मुंबई , जून 23 -- रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) के नेता और सांसद एन. के. प्रेमचंद्रन ने मंगलवार को एक बड़ा मुद्दा उठाते हुए कहा कि बहुत ज्यादा मोबाइल और इंटरनेट का इस्तेमाल हमारे दिमाग और मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है। इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

श्री प्रेमचंद्रन ने मनापुरम फाउंडेशन द्वारा मुंबई में आयोजित 'मनापुरम डायलॉग्स' कार्यक्रम में कहा कि डिजिटल तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) ने हमारे जीवन को पूरी तरह बदल दिया है, लेकिन मानसिक सेहत पर इसके जो बुरे असर पड़ रहे हैं, उन्हें समझना और उनके प्रति लोगों को जागरूक करना बेहद जरूरी हो गया है।

सांसद ने जोर देकर कहा कि तकनीक को इंसानों की सहूलियत के लिए काम करना चाहिए, न कि इंसानों को तकनीक का गुलाम बन जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज लोग पूरी तरह से डिजिटल उपकरणों पर निर्भर होते जा रहे हैं, जिससे उन्हें इसकी लत लगती जा रही है। इस वजह से लोगों की किसी काम पर ध्यान लगाने, गहराई से सोचने और बाहरी दुनिया से जुड़ने की क्षमता कम होती जा रही है।

श्री प्रेमचंद्रन ने कहा कि इस गंभीर समस्या के प्रति आम जनता, खासकर युवाओं को जागरूक करने की जरूरत है और वह इस मुद्दे को देश की बड़ी नीति बनाने वाले मंचों पर भी उठाएंगे। यह पूरा कार्यक्रम इसी बात पर चर्चा करने के लिए रखा गया था कि डिजिटल तकनीक का ज्यादा इस्तेमाल हमारे दिमाग पर क्या असर डाल रहा है और इसमें देश के बड़े डॉक्टरों, नीति निर्माताओं और समाजसेवियों ने हिस्सा लिया।

इस कार्यक्रम में बेंगलुरु के प्रसिद्ध मानसिक रोग संस्थान निमहंस के प्रोफेसर डॉ. मनोज शर्मा और जाने-माने मनोचिकित्सक डॉ. हरीश शेट्टी ने भी हिस्सा लिया। दोनों विशेषज्ञों ने इस बात के वैज्ञानिक और सामाजिक सबूत सामने रखे कि किस तरह मोबाइल की लत लोगों की मानसिक स्थिति और आपसी रिश्तों को बिगाड़ रही है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे मनापुरम फाइनेंस लिमिटेड के प्रबंध निदेशक वी. पी. नंदकुमार ने कहा कि समाज को प्रभावित करने वाले ऐसे गंभीर मुद्दों पर बातचीत शुरू करना कॉर्पोरेट जगत की जिम्मेदारी है। उन्होंने साफ किया कि उनका मकसद तकनीक का विरोध करना या उसे बंद करना नहीं है, बल्कि वह चाहते हैं कि लोग बिना किसी लत के इसका समझदारी और संतुलन के साथ इस्तेमाल करना सीखें।

भारत में मानसिक स्वास्थ्य की मौजूदा स्थिति पर बात करते हुए डॉ. हरीश शेट्टी ने एक चौंकाने वाला आंकड़ा साझा किया। उन्होंने बताया कि आज देश में हर सात में से लगभग एक व्यक्ति किसी न किसी तरह की मानसिक परेशानी या तनाव से जूझ रहा है। उन्होंने कहा कि इस बीमारी को शुरुआत में ही पहचानना और पीड़ितों की मदद के लिए एक मजबूत व्यवस्था बनाना बहुत जरूरी है।

डॉ. शेट्टी ने युवाओं में बढ़ते अवसाद और आत्महत्या के मामलों पर गहरी चिंता जतायी। उन्होंने इसके लिए परिवारों में होने वाले आपसी झगड़ों, प्रेम संबंधों की समस्याओं और पढ़ाई-लिखाई के भारी दबाव को सबसे बड़ी वजह बताया।

इस दौरान कार्यक्रम में आए विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि बच्चों और किशोरों के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल उनकी उम्र के हिसाब से तय होना चाहिए और उनके लिए कड़े सुरक्षा नियम बनने चाहिए। उन्होंने कहा कि बच्चों को इंटरनेट के खतरों से बचाने के लिए माता-पिता, स्कूलों, टेक कंपनियों और सरकार को मिलकर काम करना होगा।

दिमाग पर पड़ने वाले चिकित्सकीय असर के बारे में समझाते हुए डॉ. मनोज शर्मा ने कहा कि भले ही चिकित्सा की भाषा में 'डिजिटल डिमेंशिया' (ज्यादा मोबाइल चलाने से याददाश्त कमजोर होना) को अभी कोई आधिकारिक बीमारी न माना गया हो, लेकिन यह हमारी खराब जीवनशैली की एक बहुत बड़ी समस्या बनकर उभर रहा है।

डॉ. शर्मा ने चेतावनी दी कि जो लोग हर समय इंटरनेट और सोशल मीडिया पर खोए रहते हैं, उनकी पढ़ाई का स्तर गिर रहा है, उनकी याददाश्त कमजोर हो रही है और चीजों को समझने की दिमागी क्षमता घट रही है। उन्होंने यह भी बताया कि काम के बीच बार-बार मोबाइल की तरफ ध्यान भटकने की वजह से दफ्तरों में लोगों के काम करने की रफ्तार और उनका प्रदर्शन भी खराब हो रहा है।

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