जगदलपुर , अक्टूबर 21 -- छत्तीसगढ़ में बस्तर के ऐतिहासिक दशहरे में मंगलवार देर शाम मावली परघाव की पारंपरिक रस्म श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न हुई। इस दौरान मां दंतेश्वरी के छत्र और मां मावली की डोली का बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव सहित हजारों श्रद्धालुओं ने स्वागत किया।

राजपरिवार ने फूलों का विशेष ताज कांटाबंद धारण कर 618 साल पुरानी परंपरा का निर्वहन किया। माता के आगमन पर सड़कों पर फूल बिछाए गए और श्रद्धालुओं ने जगह-जगह पुष्पवर्षा कर स्वागत किया। इस दौरान जमकर आतिशबाजी हुई। माता की डोली और छत्र के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। घरों की छतों से भी लोगों ने माता के दर्शन किए।

दंतेवाड़ा जिले के कलेक्टर और एसपी भी माता की डोली और छत्र के साथ जगदलपुर पहुंचे। यहां राजपरिवार के सदस्यों के साथ कलेक्टर, एसपी और प्रशासनिक अधिकारियों ने परंपरागत विधि से देवियों का स्वागत किया।

बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव ने बताया कि मावली परघाव के अवसर पर बस्तर के राजा कांटाबंद पहनकर माता की आराधना करते थे। फूलों से तैयार किया जाने वाला यह विशेष ताज राजा के सिर पर धारण करने की परंपरा का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि वे भी इस परंपरा को निभा रहे हैं।

उन्होंने बताया कि कांटाबंद में इस्तेमाल होने वाला फूल बस्तर के जंगलों में मिलता है और इसकी अपनी अलग खासियत है। परंपरा के अनुसार कांटाबंद धारण कर उन्होंने मां दंतेश्वरी के छत्र और मां मावली की डोली को प्रणाम किया। इसके बाद माता की डोली को कंधे पर उठाकर राजमहल लाया गया।

कमलचंद्र भंजदेव ने बताया कि मां दंतेश्वरी और मां मावली बस्तर राजपरिवार की कुल देवी हैं। दोनों देवियां सदियों से बस्तर दशहरे में शामिल होने आती रही हैं। दशहरे में सहभागिता के बाद विदाई होने तक देवियां राजमहल परिसर में ही विराजमान रहेंगी।

मावली परघाव की रस्म देखने के लिए बस्तर के अलावा ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना सहित अन्य राज्यों से भी बड़ी संख्या में लोग जगदलपुर पहुंचे। डेनमार्क से आए विदेशी पर्यटकों के एक समूह ने भी इस अनूठी परंपरा को करीब से देखा। ओडिशा से आए श्रद्धालुओं ने कहा कि उन्होंने पहली बार माता के दर्शन किए।

डेनमार्क के पर्यटकों ने बताया कि वे पहली बार बस्तर आए हैं। यहां के लोगों का सरल और सहज व्यवहार उन्हें काफी पसंद आया। उन्होंने कहा कि बस्तर दशहरे की रस्में अनूठी हैं और यहां की परंपराएं दूसरी जगहों से अलग हैं। इस आयोजन के माध्यम से उन्हें बस्तर की संस्कृति, धार्मिक आस्था और पुरानी परंपराओं को करीब से जानने का अवसर मिला।

बस्तर दशहरे की परंपरा के तहत राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव शारदीय नवरात्र की पंचमी पर दंतेवाड़ा पहुंचे थे। वहां उन्होंने मां दंतेश्वरी को मंगल पत्र अर्पित कर बस्तर दशहरे में शामिल होने का निमंत्रण दिया था। इसके बाद अष्टमी के दिन माता की डोली और छत्र को जगदलपुर के लिए रवाना किया गया।

अष्टमी की देर रात माता की डोली और छत्र जगदलपुर पहुंचे। इसके बाद कल देर शाम मावली परघाव की रस्म पूरी हुई। इस परंपरा के तहत राजपरिवार पारंपरिक विधि-विधान से माता की डोली और छत्र का स्वागत करता है।

बस्तर दशहरे के अंतर्गत जगदलपुर के सिरहासार भवन में जोगी उठाई की रस्म भी संपन्न हुई। इस परंपरा में जोगी नौ दिनों तक उपवास रखकर कुंड में बैठते हैं और माता की आराधना करते हैं। दशहरे की शुरुआत में ही जोगी तपस्या पर बैठ जाते हैं, ताकि पूरा आयोजन बिना किसी बाधा के संपन्न हो सके।

नौ दिनों की तपस्या पूरी होने के बाद जोगी को कुंड से उठाया गया। इसके बाद माता के स्वागत की रस्म पूरी की गई। बस्तर दशहरे में जोगी उठाई का विशेष धार्मिक और पारंपरिक महत्व है।

बस्तर दशहरे के आगामी चरण में आठ चक्कों वाले विजय रथ की परिक्रमा होगी। इस दौरान किलेपाल के ग्रामीण रथ खींचेंगे। परिक्रमा पूरी होने के बाद भीतर रैनी की रस्म निभाई जाएगी।

भीतर रैनी की परंपरा के तहत ग्रामीण प्रतीकात्मक रूप से विजय रथ को चुरा लेते हैं। यह बस्तर दशहरे की प्राचीन परंपराओं में शामिल है, जिसमें स्थानीय ग्रामीणों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

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