जगदलपुर , अक्टूबर 22 -- विश्वप्रसिद्ध ऐतिहासिक छत्तीसगढ़ के बस्तर दशहरे में गुरुवार को 'बाहर रैनी' की पारंपरिक रस्म संपन्न हुई। इस अवसर पर कुम्हड़ाकोट के जंगलों में छिपाकर रखे गए आठ चक्कों वाले विशाल विजय रथ को माड़िया समुदाय और राजपरिवार के सदस्यों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ वापस राजमहल के सिंह द्वार तक पहुंचाया। इसके साथ ही बस्तर दशहरे की रथ परिक्रमा की रस्म का विधिवत समापन हुआ।
परंपरा के अनुसार, 'भीतर रैनी' की रस्म के बाद माड़िया जनजाति के लोग विशाल विजय रथ को खींचकर शहर से दूर लालबाग स्थित कुम्हड़ाकोट के जंगलों में ले गए थे। बस्तर दशहरे की यह प्रतीकात्मक 'रथ चोरी' राजा और प्रजा के बीच संवाद, अपनत्व और पारंपरिक मान-मनौव्वल का प्रतीक मानी जाती है।
गुरुवार को 'बाहर रैनी' की रस्म के दौरान बस्तर राजपरिवार के सदस्य रथ को वापस लाने के लिए कुम्हड़ाकोट पहुंचे। वहां उन्होंने माड़िया समुदाय के लोगों और ग्रामीणों से आत्मीय संवाद किया। परंपरा के अनुरूप ग्रामीणों की मान-मनौव्वल की गई, जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच सौहार्दपूर्ण वातावरण में रस्म आगे बढ़ी।
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