कोण्डागांव , मई 25 -- छत्तीसगढ़ में स्थित बस्तर संभाग के कोंडागांव जिले में फास्ट फूड और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों के बढ़ते चलन के बीच बस्तर अंचल की पारंपरिक खानपान संस्कृति को नया बाजार और पहचान दिलाने का कार्य फरसगांव की सीमा मंडावी कर रही हैं।

सीमा मंडावी (45) अपने पारंपरिक व्यंजनों और प्राकृतिक जीवनशैली के जरिए न केवल बस्तरिया स्वाद को सहेज रही हैं, बल्कि महिला आत्मनिर्भरता की मिसाल भी बनकर उभरी हैं।

बारहवीं तक शिक्षित सीमा मंडावी तीखुर शरबत, तीखुर बर्फी, मंडिया (रागी) पेज और पारंपरिक 'पान रोटी' जैसे स्थानीय व्यंजनों के माध्यम से लोगों को बस्तर की पौष्टिक और प्राकृतिक खाद्य संस्कृति से जोड़ रही हैं। उनकी बनाई 'पान रोटी' विशेष रूप से लोगों के बीच लोकप्रिय हो रही है। इसे केले के पत्ते में चावल के आटे की परत लगाकर तैयार किया जाता है, जिसमें नारियल, गुड़ और इलायची भरकर पारंपरिक तरीके से स्टीम किया जाता है।

सीमा मंडावी ने कहा, "जीवन में सबसे पहले प्रकृति, फिर संस्कृति और उसके बाद शिक्षा का स्थान है। शुद्ध और प्राकृतिक भोजन ही अच्छे स्वास्थ्य की सबसे बड़ी कुंजी है।" उन्होंने बताया कि वे अपने उत्पादों की शुद्धता बनाए रखने के लिए बाजार के दूध का उपयोग नहीं करतीं, बल्कि घर में पाली गई देशी गाय के दूध से ही छांछ और लस्सी तैयार करती हैं। उनका मानना है कि एक गाय परिवार के चार सदस्यों का पालन-पोषण कर सकती है। स्वच्छता को लेकर सजग सीमा काम के दौरान सिर पर स्कार्फ बांधती हैं, ताकि खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता बनी रहे।

सीमा का मानना है कि गांवों में स्व-सहायता समूहों के माध्यम से महिलाएं आत्मनिर्भर बन सकती हैं। उनका कहना है कि जब व्यक्ति अपनी बनाई वस्तुओं का उपयोग करता है तो उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। उन्होंने पारंपरिक जीवनशैली, स्थानीय खानपान और महिला सशक्तिकरण को साथ जोड़ते हुए यह साबित किया है कि अपनी जड़ों से जुड़कर भी विकास की नई राह बनाई जा सकती है।

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