नयी दिल्ली , फ़रवरी 08 -- ंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के संयोजन में रविवार को नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'काशीस्थ' पर केंद्रित एक विचारगोष्ठी का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर मुख्य वक्ता राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने काशी को केवल एक नगर नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की आत्मा बताते हुए कहा कि यह ग्रंथ काशी के धार्मिक, दार्शनिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरूप को गहराई से प्रस्तुत करता है।
उन्होंने कहा कि बनारस, काशी या वाराणसी धर्म, विद्या, कला, संगीत और मानवीय सह-अस्तित्व की भूमि है। इसकी गलियां, घाट, स्मृतियां और बौद्धिक परंपराएं हमारी अमूल्य धरोहर हैं। उन्होंने यह भी कहा कि तकनीक कितनी ही सशक्त हो जाए, वह पुस्तक का स्थान नहीं ले सकती और परम्परा को नए संदर्भों में आगे बढ़ाना ही बौद्धिक कर्म है।
विशिष्ट वक्ता सच्चिदानंद जोशी ने पुस्तक की शोधपरक दृष्टि की सराहना करते हुए कहा कि 'काशीस्थ' काशी को समग्रता में समझने का सशक्त प्रयास है, जो अकादमिक जगत और सामान्य पाठकों दोनों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा। उन्होंने कहा कि काशी एक शहर भर नहीं, बल्कि एक अनुभूति है और उसमें अद्भुत सम्मोहन है।
प्रो. धनंजय सिंह ने अपने आधार वक्तव्य में काशी को भारतीय ज्ञान-परंपरा का जीवंत केंद्र बताते हुए कहा कि ऐसी कृतियां सांस्कृतिक स्मृति को सुदृढ़ करती हैं तथा परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु का कार्य करती हैं। उनके अनुसार यह पुस्तक केवल एक शहर नहीं, बल्कि सभ्यता के इतिहास को सामने लाती है। व्योमेश शुक्ल ने बताया कि पुस्तक में 13 साहित्यकारों के 17 लेख संकलित हैं, जिनमें आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का अप्रकाशित लेख भी शामिल है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विद्वान, शोधार्थी और साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।
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